Tuesday, February 28, 2017

हर दिन की एक शाम है,और शाम की इक सहर


          सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...
 

अक्सर ऐसा होता है जब भी मै ये गाना सुनती हूँ तो इसकी एक लाइन.....
 "होता तू पीपल, मैं होती अमर लता तेरी,तेरे गले माला बन के, पड़ी मुसकाती रे..."  पर  मेरी सुई अटक जाती है, और मै सोचने लगती हूँ कि माना कि बहुत लोगो को ये बड़ा ही रोमांटिक लगता होगा पर साइंटिफिक नज़रिए से ये बहुत ही डेडली है! ऊपर से कहना कि..... 'तेरे गले माला बन के, पड़ी मुसकाती रे'..... बाप रे!! पीपल की जान गई (साथ में हमारी आक्सीजन भी )..... और अमर लता मुस्कराती हुई? अमर बेल या लता, जो भी कहो, इंसानों  के लिए तो कुछ हद तक तो ये ठीक है मगर प्यारे पीपल या किसी भी पेड़ के लिए फांसी का फंदा होती है.... एक पैरासाइट,  जब तक होस्ट पेड़ की सारी ताकत नही सोख लेती तब तक उसका पीछा नही छोड़ती, और जब उसकी जान निकाल  लेती है तो  फिर दूसरे पेड़ पर चढ़ जाती है! ये कभी मरती नही, जब ये सूखी हुई होती है तो भी नही मरी हुई होती, ये सिर्फ और सिर्फ वेट कर रही होती है.... होस्ट पेड़ के हरे भरे होने का, या दूसरे पेड़ पर कूदने का! कुछ स्टारफिश की तरह ये कभी पूरी तरह खत्म नही होती चाहे इसके कितने टुकड़े हो जायें, ये हर टुकड़े में से नया जन्म ले लेती है और सदा रहती है, एकदम ज़िंदा, हमेशा के लिए!!! थोड़ा डरावना हैं न? इसका एक टुकड़ा घर के किसी गमले में लगे पौधे पर 
डाल कर कुछ दिनों बाद देखना!! ये कुछ उस पुरानी इंग्लिश फिल्म 
"Carnival of Souls(1962)" जैसा डरावना लगता है!   


28.02.2017/ 01:40 दोपहर
और जाने कितने पहर,
                    पहरों पर पहरा है...
                    हर दिन
की एक शाम है
                    और शाम की इक सहर!!


Friday, February 24, 2017

एक ख्याल जो बुझता नही... न ही होता है राख़



                            
                          समय
  
                         समय से 
                        समय बीत रहा है,  
                        सपनों में बनती 
                         बिगड़ती हैं तस्वीरें,  
                        खुली आँख.... सब कुछ 
                         अपनी जगह पर था 
                          जैसा था वैसा ही था,  
       
                         बदल गया समय..... 
                        चीज़े - जगह.... इतिहास    
                        बनती - बनाती गयी, 
                        बातें पुरानी हो गयी....  
                        लोग नये थे... 
                        ज़ख्म पुराने, 

                        समय भरता है 
                        ज़ख्म..... और भूला 
                        देता है बातें - यादें, 
                        बातें भूली सी हो जाती हैं.. 
                        यादें पुरानी एलबम की 
                        तस्वीरों सी.... जो देती नही 
                        दस्तक समय के दरवाज़ों पर, 

                        समय लौटा लाता है, और 
                        लौटा देता है..... एक ख्याल 
                        जो बुझता नही.... 
                        न ही होता है राख़, 
                        पर सजा रहा है 
                        समय अंतराल में 
                        एक सज़ा की तरह... 
                        हर पल सालता है 
                        आत्मा को.... 

                        समय बीत रहा है 
                        अभी भी... समय के साथ 
                        समय से.... बिना पूछे 
                        कहे और बताये!!   

                       07.02.2017/ 09:50 रात, 
                      कुछ लोग उदास होते हैं, और 
                      भटकते हैं.... जाने कहाँ 
                      और जाने किधर... फिर भी लौटते हैं 
                      घर की ओर.. तुम क्यों नही जाते 
                      लौट... घर की ओर.... तुम आज भी 
                      नही लौटे और भटकते हो.. 
                      अगर तुम चाहोगे 
                      घर पहुचना... और चलोगे 
                      उस ओर... तो घर पहुच ही जाओगे.... 
                      अगर तुम चाहोगे!!!

Monday, February 6, 2017

हो नफरत तुम्हे हमसे चाहे जितनी... मगर अपने आंसू छुपाये रखना

           


                                दिल की ज़मीन
         
         
                             जब हम उखड़ते हैं
                             दिल की ज़मीन से....
                             तो क्या हम लौटते हैं
                             वापस बूझे अंधेरे
                             वीरानों में... जहाँ कोई 
                             होती नही रोशनी, या
                             हम जोड़ते हैं खुद को
                             किसी और ज़मीन से
                             जहाँ नमी हैं - ठंडक है
                             और होती है धूप
                             पनपने के लिए, 
   
                              ज़िन्दगी फिर लेती है
                              नया रूप - नया रंग....
                              बहारें आती हैं लौट
                              खिलाने नये फूल,
                              इन्द्रधनुष के सारे रंग
                              भरते हैं उम्मीदों में रंग
                              और दो आँखें जो
                              देखती हैं हर पल
                              कहती हैं बिना कहे
                              सब कुछ, और थाम लेती हैं
                              गिरने से पहले..... जो
                              देखती नही अँधेरा अतीत का...
                              सिर्फ झांकती हैं
                              वर्तमान की आँखों में
                              मुस्करा कर, और थाम
                              लेती हैं हाथ, खेंचती हैं
                              अपनी और, और कर
                              देती हैं अपने से भी आगे...
                              आगे बढ़ने के लिए
                              देती हैं सहारा, और
                              धीरे से कहती हैं
                              कानों में..... डरना नही
                              मै हूँ तुम्हे देखता
                              हर नज़र से पहले,
                              जब भी देखोगी पलटकर
                              कभी भी - कही भी
                              मुझे पाओगी
                              निगहबान अपना!!
   
   
   
                             03.02.2017/ 04:46 शाम,
                             तुम गुज़रते हो करीब से
                             हर बार मेरे होने को
                             ठुकराते हुए..... क्या
                             बाद मेरे यूँही तुम...
                             प्रिय इसी तरह मेरे
                             न होने को भी ठुकराओगे...

Saturday, February 4, 2017

एक बात याद आयी कुछ दिन के बाद



     
                     
लडखडाये कदम तो नहीं, लडखडाये ख्याल थे
     
      

 सर्दियों में शाम अभी ढली भी नही होती कि अंधरा फैलने लगता है और तरह तरह के बल्ब चारो ओर जगमगाने लगते हैं! लोगों की भीड़ एक -दूसरे को धकेलती, पटरियां बदलती और ट्रैफिक अपनी ही रफ्तार में रेंगता हुआ चल रहा था! यह इलाका ही कुछ ऐसा है कि यहाँ तेज़ रफ्तार में गाडी तो क्या रिक्शा भी नही चल सकता! 
        

दूकान का दरवाज़ा अंदर की ही तरफ खुलता है तो मैंने धीरे से उसे पुश किया और अपने आप को मीठी खुशबु की लहरों में पहुचा दिया! दूकान में दो ही लोग थे खड़े थे मिठाई या फिर समोसे लेने के लिए और तीसरा इंसान मै थी! इस दूकान का काउंटर कुछ इस तरह बना है कि अगर वहां दो तीन लोग एक साथ खड़े हो मिठाई लेने कि लिए तो फिर दरवाज़ा खुल नही सकता! जितनी तेज़ रफ्तार से चलकर उस शाम मै अपनी मनपसन्द मिठाई की दूकान 'अन्नपूर्णा' पहुची थी! ये मुझे ही पता है! अरे ! वहां समोसे जल्दी खत्म हो जाते है इसलिए! पर उस दिन समोसे थे, मुझे देखते ही
 वो जाने पहचाने, बरसों से वही मुस्कराहट बिखेरते हुए, मिठाईवाले जादूगर बोले.. 'आह! आज समोसा खत्म नही हुआ है, आप ठीक टाइम पर आयी!'
     

 समोसों के साथ मिठाई भी पैक करने के लिए बोल कर मैंने एक समोसा खाने के लिए अभी कहा ही था कि किसी ने मेरे पीछे से इतने करीब आकर मुझ से पूछा, 'यहाँ कौन सा मिठाई अच्छा हे?'.... अरे, हे ही बोला था, मात्रा की गलती नही है! मैंने चौक कर देखा तो एक अजीब सा करैक्टर खड़ा था, कैमरे की नजरों से देखने की वजह से मुझे किसी खास समय और जगह में मिले लोग अलग - अलग करैक्टर ही समझ में आते हैं! मै कुछ सेकंड के लिए  कन्फ्यूज़ हुई, फर्स्ट ऑफ़ आल मुझे इडियट की तरह इतना करीब आकर बात करने वाले लोग पसंद नही ऊपर से वो अगर अजनबी हों तो समझ नही आता कि वो क्या चाहते हैं..  'किस या  किक'... खैर 'किस' के लायक न वो शक्ल थी और न ही तमीज़ (manner)!
 

जाने कुछ ही देर में कहाँ से इतनी भीड़ हो गई थी दूकान में!! 'आप को कौन सी मिठाई चाहिए?' अपने अंदर के शांत कुंगफू पांडा को सम्भाल कर मैंने पूछा! 'नई हम पूछता है यहाँ कौन सा मिठाई अच्छा है?' उस इन्सान ने   फिर उसी अंदाज़ में पूछा! अभी मै सोच ही रही थी कि क्या बोलूं कि तभी बगल में से उस भीड़ में से 'जिन' की तरह एक दूसरा कैरक्टर प्रकट हुआ! 'आप कोन सा मिठाई बतायेगा अच्छा है?' वह बोला! मैंने मिठाई की तरफ इशारा कर कहा 'सोंदेश', दोनों ने क्या सुना पर एक साथ बोले..' ओ अच्छा सन्देश!' अचानक मुझे अहसास हुआ एक दबी सी ड्रिंक की महक है तो मुझे समझ आयी सारी समस्या!!
   
 जो लोग अक्सर पीते हैं और पी-पी कर सध जाते हैं उनकी ज़बान नही लडखडाती वे नोर्मल्ली ही बात करते हैं! वो दिन के किसी भी पहर में पी सकते हैं और सधे होने की वजह से पता नही चलता! पर दरसल ऐसा नही है उनके कदम चाहे लडखडाये हों या नही पर ख्याल लडखडाये हुए होते हैं! बस वही था यहाँ भी! उनकी वो अजीब मिठाई कुएरी बढ़ रही थी और डिस्टेंस कम! मुझे लगा अब ये दोनों कैरक्टर गले में बाहें डाल कर ये न कहें, 'ओये कोचे गुलबदन वल्लाह, तुम कोन सा मिठाई खायेगा?'
     

 मैंने उस मिठाईवाले जादूगर की तरफ देखा और कहा इन से पूछिये! मिठाईवाला जादूगर उन्हें मिठाई दिखा रहा था! हर बार की तरह समोसा आज भी अच्छा था! दूकान में अब भीड़ नही थी सिर्फ वो दो कैरक्टर थे मिठाई लेते हुए! कांच की खिड़की से बाहर की भीड़ दिखाई दे रही थी! फैलती रौशनी, बढ़ता अंधेरा और शोर, जो कांच की वजह से अंदर नही सुनायी देता था! बाहर निकलते हुए हर बार की तरह मिठाईवाले जादूगर को बाय - बाय किया, दरवाज़ा खोलते ही बाहर का शोर दूकान में चला आया! मै उस शोर में बढती चली गई! चलते हुए मै सोच रही थे कि वो दोनों कैरक्टर मिठाई की रेसिपी जरूर पूछेंगे!   
 

अक्सर कहानियों के कैरक्टर असल ज़िन्दगी में से ही निकलते हैं, कभी अजीब से... कभी कमाल के! राइटर की कलम कभी नही लड़खड़ाती मगर उसके ख्यालों का पता नही चलता कि वो कब लडखडा जायें! वैसे भी more or less सारे राइटर आधे ही पागल होते हैं!     


             04.02.2017/ 06:50 शाम,
             कोई पुकारेगा कभी..
             कोई सम्भालेगा कभी,
             राह उलझी नही...
             कदम लडखडाये नहीं,
             पर जो लडखडाये थे
             वो ख्याल बेहिसाब हैं!!