Saturday, January 16, 2016

यादों का सफ़र बीते न कभी और दिन गुज़र जाये ज़िन्दगी की तरह


                              
                                        अकेला
                              
                                           I
                           
                               बारिशों की रिमझिम
                               पड़े ऐसी छमछम ....
                               ऐसी.... जैसी... कोई माने न....आ ....
                               कोई माने ना.....
                               मन रे..ऐ...तू... माने, माने न
                              
                               छम..छम... छम... छम ....
                               पड़े ऐसी ..... छम - छम ...
                               गुनगुनाता है..... बादलों का...
                               ये जहाँ.............
                               धरती पूकारे है... मगर...
                               दूर.... आसमां.... आ....
                              
                               धीरे....धीरे, रूक - रूक
                               कहे बादल झूक - झूक....
                               ऊँचा है.. गहरा-प्यार का जहाँ...
                               डूब जायें हम अगर... पर
                               पार होगा दिल यहाँ -
                               मन रे...ऐ...तू माने... माने न!! 
                              
                              
                                            II
                                      
                               बारीश की आहट में
                               बारीश के ये जो पल
                               भूले नही है हम
                               भूलेंगे तुम न हम ...
                               ज़िन्दगी.... बस यूहीं
                               बीत जायेगी....
                              
                               याद में तुम रहोगे
                               यूही कही....
                               जब भी .... हम तुम्हें मिले
                               कहना न.... नही.... कुछ
                               बस,.... थाम लेना वही....
                               ज़िन्दगी... बस, यूही बीत जायेगी...

                               यादों का सफ़र 
                               बीते न कभी....
                               और.. दिन गुज़र जाये...ऐ..
                               ज़िन्दगी की तरह...
                               जब भी.... हम तुम्हें मिलें..
                               कहना न... नही... कुछ..
                               बस, ..... थाम लेना वही-!!
                           
                           
                           
                             अकेला कहानी में से लिए ये गीत! जिन्हें लिखते
                             हुए दिल और दिमाग उन्ही में जिया......
                             कहानी ज़िन्दा करने के लिए उसमें जीना और
                             मरना पड़ता हैं.... और कहानी में मरे बिना
                             उसे ज़िंदा नही किया जा सकता!!

                              

Friday, January 15, 2016

डूब चला था नींद में.... अच्छा किया जगा दिया!!


                                   बस स्टाप कनेक्शन
           
'आज गाड़ी कहाँ गयी तुम्हारी?' शोभना ने आते ही पूछा!
'खराब है....गैराज में है!' दिवाकर ने शोभना के दोनों हाथ थाम मुस्करा कर कहा!
शोभना बगल में बैठ गई! हवा में गर्मी थी!
'क्या तुम्हे लगता है...बारीश होगी.. गर्मी काफी पड़ रही है.....बारीश होनी चाहिए!' शोभना आसमान की तरफ देखती हुई बोली!
'मेरी लाईफ में कब बारीश होगी.... मै यह सोच रहा हूँ!' दिवाकर हंसकर बोला!
'कैसी बारीश चाहिए तुम्हें?' शोभना ने भी हंसते हुए पूछा!
'तुम्हारी ..... एक-एक बूंद...... एक- एक हवा....एक-एक महक वाली!' दिवाकर ने शोभना के कान में धीरे से कहा!
शोभना ने मुस्करा कर दूसरी तरफ मूँह फेर लिया! तीन-चार और लोग भी वहाँ बैठे थे! एक लड़की शोभना को गौर से देख रही थी! दोनों की नज़रे मिली दोनों मुस्करा दी!
'तुम भी क्या बोलते रहते हो.... हमारे बीच ऐसा कुछ भी नही है..... और न कुछ होने की गुंजाईश है!' शोभना ने वापस दिवाकर की तरफ देख कहा!
'मै इंतज़ार कर सकता हूँ..... जैसे पिछले एक साल से कर रहा हूँ.... तुम मुझे कभी तो समझोगी!' दिवाकर ने शोभना का हाथ पकड़ कहा!
शोभना ने धीरे से अपना हाथ खींचा और मुस्करा दी! फिर पलट कर उसी लड़की की तरफ देखा! वो भी शोभना की तरफ देख रही थी! शोभना उसे देख मुस्कराई!
'तुम अच्छे एक्टर हो... इसका ये मतलब नही कि एक्चुअल लाइफ में भी एक्टिंग करोगे..... दिवाकर हम सिर्फ अच्छे दोस्त है.... सिर्फ दोस्त, उससे एक इंच न एक सेंटीमीटर इधर न उधर... कुछ भी नही..... प्यार तो दूर की बात है!' शोभना ने दिवाकर से कहा!
तभी दूसरी लड़की उठकर शोभना के पास आ गई!
'हाय, मेरा नाम रूबी है... तुम डांसर हो न?' उस लड़की ने हाथ बढाया!
शोभना ने जल्दी से उसे हेलो किया!
' हाय, मेरा नाम शोभना है... ओह नही, मै डांसर नही हूँ...क्रिएटिव डिजाईनर हूँ!' इतना कह शोभना खडी हो गई!
'स्ट्रेंज तुम्हारी शक्ल एक डांसर से मिलती है!' रूबी बोली, फिर दोनों हँस पड़ी!
'मै भी डिजाईनर हूँ... हम लोग बात कर सकते है!' रूबी फिर से बोली!
'अच्छा! क्यों नही (शोभना दिवाकर की तरफ मुडी ) दिवाकर मै कल मिलूंगी.... प्लीज़ बाद में बात करते हैं!' शोभना फटाफट अपना पर्स उठाते हुए बोली!
'पर..... शोभना...... मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है!' दिवाकर शोभना के हाथ पकड़ कहते हुए खड़ा हो गया! पर शोभना ने उसे वापस बैठा दिया!
'कल कह देना..... हम सिर्फ फ्रेंड है.....प्लीज़ समझो!' शोभना अपना हाथ छुडाते हुए बोली और उस लड़की यानी रूबी के साथ चल पड़ी!

दिवाकर हैरान सा बैठा का बैठा रह गया! शोभना और रूबी सड़क पार कर दूसरी तरफ चले गये! रूबी ने ईशारे से ऑटोरिक्शा रोका!

दिवाकर अभी भी उधर ही देख रहा था! शोभना ने ऑटो में बैठने से पहले हाथ हिला कर दिवाकर को फिर से बाय किया! दिवाकर ने भी धीरे से बेमने से बाय किया!
ऑटो चला गया! 

हवा में अभी भी गर्मी थी! बीच-बीच में धूल उड़ती तो दिवाकर आँखें बंद कर लेता! जब भी आँखें बंद होती तो शोभना का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता!
कल रात दोनों साथ थे! कितनी मुलायम है वो..... पिछले ग्यारह महीने और बारह दिन से वह उसके मुलायम होने के अहसास से वो बाहर नही निकल पाया!
पर शोभना कहती है कि सेक्स और प्यार दो अलग बाते है! शरीर और मन दोनों का तालमेल सिर्फ सच्चे प्यार में हो सकता है.... बाकी सब एक पल का ख्याल है एक चाहत है.... पा लेने की! वैसे भी सच्चा प्यार जैसी कोई चीज़ नही होती! लोग दिन बिताते है.....उन्हें सिर्फ ज़रूरत होती है.... चाहे किसी चीज़ की हो या फिर जिस्म की!
'उफ! वो ये सब कैसे कह सकती है! वो सब सुबह....वो दोपहर.... वो शामें....या फिर वो रातें.... सिर्फ ज़रूरत थी! शोभना तुम ऐसे क्यों कर रही हो मेरे साथ!!!!'
दिवाकर उस गर्म धूप में ये ठंडी बातें सोच रहा था! वह कहीं अंदर ही अंदर उदासी में डूब रहा था!

कल कैसे सूजाता को मैंने भी यही कहा था कि हम सिर्फ दोस्त है....दोस्त, और सूजाता चूपचाप खडी रही! क्या वह अभी भी खडी होगी???

'भाई साहब, आपके पास माचीस होगी?' किसी की आवाज़ से दिवाकर का ध्यान टूटा!
एक लड़का था, वह बगल में ही बैठा था शूरू से! दिवाकर में ने जेब से लाईटर निकाल कर उसे दिया! उस लड़के ने सिगरेट सुलगाई और लाईटर वापस कर दिया!
'माफ कीजिए आपसे पूछा नही....आख़री सिगरेट थी!' इतना कह वह हँस पड़ा!
पर कश ले दिवाकर की तरफ सिगरेट बढ़ाई पर दिवाकर ने मना कर दिया!
'एक सिगरेट ही है जिसे आप बिना हिचक शेयर कर सकते है!' वह लड़का बोला!
दिवाकर सिर्फ मुस्करा कर रह गया!
पर वह लड़का फिर बोला- 'आपकी दोस्त चली गई...... मै कभी इन औरतों को समझ नही पाया.....पर मेरे अनुसार औरतें दो तरह की होती है.... एक फ्रस्ट्रेटिड और दूसरी लिस्बिएयन!'
दिवाकर ने हैरान हो उस लड़के की तरफ देखा और बोला- 'औरत तो तुम्हारी माँ भी है?'
'हाँ, है न..... पर वो फ्रस्ट्रेटिड है..... सारी उम्र मेरे पिता से दुखी रही फिर भी दरवाजे पर खडी इंतज़ार करती.... चुपके - चुपके रोती..... पर मेरे पिता को छोड़ कर नही गयी.....तुम्हारी दोस्त जैसी औरतो की परेशानियाँ हाई क्लास है.....वह तुम्हे छोड़ कर चली गई!!!'
वो लड़का बोल रहा था मगर दिवाकर जाने कहा खो गया था! शायद सूजाता याद आ रही थी! साथ अपनी बाते भी......
'शोभना लिस्बिएयन भी है दिवाकर.....
'मुझे कोई फर्क नही पड़ता.....
'पर मै तुमसे बेहद प्यार करती हूँ.....
'पर मै तुम्हे सिर्फ अच्छा दोस्त मानता हूँ.....
'कितना अजीब है न, मै तुम्हे प्यार करती हूँ मगर तुम शोभना से....जानते हो दुनियाँ में दो तरह की औरतें होती है... एक वो जो प्यार करती है जैसे कि मै....... और दूसरी वो जो प्यार करवाती हैं जैसी कि शोभना......
'तुम्हारी बातें मुझे कभी - कभी समझ नही आती....
'इतने ढेर सारे सालों में तुम्हें मेरी कोई तो बात समझ आयी होगी......
'हाँ, यह की, तुम बेहद अच्छी हो और मै तुम्हारे लायक नही.....

सूजाता ने उदास आँखों से सिर्फ एकटक दिवाकर की तरफ देखा! उफ!! उसकी वो आँखें!!! पर शोभना दिल से जाती ही नही!

'मेरी बस आ गई है...थैंक्स!' अचानक उस लड़के की आवाज़ ने दिवाकर का ध्यान तोड़ा!
वो लड़का चला गया!

दिवाकर ने घड़ी में टाइम देखा, पांच बज रहे थी! इस वक्त सूजाता क्या कर रही होगी!!! वह सोचने लगा-
....शायद गमलों में पानी...
खिड़की से बाहर झाँक रही......
लिख रही...... किताब पढ़ रही होगी.....
क्या कर रही होगी अभी वो???!!! मिलने का मन कर रहा है! पर बोलूंगा क्या? अचानक क्यों आया? ठीक है एक कप चाय मांग लूंगा वो ले आयेगी! मुझे मालुम है वो कुछ नही कहेगी!

दिवाकर ने ऑटोरिक्शा रोका! हवा में अभी भी गर्मी थी और बीच-बीच में धूल उड़ती तो वह आँखें बंद कर लेता! आँखों में सूजाता का चेहरा नज़र आता.... पर वही तो जा रहा था वह!!!



7.5.2006 / 2:20 सुबह सुबह कैसी कहानियों के ख्याल आते है जोकि कई दिनों बाद किसी 
15.6.2006 / 3:25 रात को पूरा होता है!!! उस पर उसे टाइप करना वो भी साढ़े नौ साल बाद..... 

Friday, January 8, 2016

तुम्हारा ख्याल बारीश की तरह... बरसता रहा... बस बरसता रहा!!!


                                       तुम्हारे बिना
             
                               कभी-कभी हम छोड़
                               आते है कोई शहर
                               पीछे के दरवाजे से निकल....
                               देख ले न कोई....
                               पूछ ले न कोई
                               सोचते हुए... बस
                               एक दिन ऐसे ही
                               किसी बारीश की
                               धूप वाली दोपहर में.....
             
                               तुम खड़ी अपनी
                               बालकनी से देखती रही
                               चुपचाप एकटक
                               मुझे जाता हुआ....
                               बहुत आसन था
                               मेरे लिए छोड़ कर जाना.....
                               तुम कभी कुछ कहती
                               क्यों नही थी...... पूछती
                               क्यों नही थी....... बस
                               देखती हो एकटक....
             
                               हवा में अपनी
                               हथेलियाँ फैलाये
                               बारीश की बूंदे
                               थामती - बिखेरती....
                               पलट कर  देखा 
                               तुम आसमान की ओर
                               देखती मुस्करा रही थी.....
                               मै जा रहा हूँ और
                               तुम आसमान.........
                               झटक कर हाथ मै
                               बढ़ गया आगे.....