Monday, July 27, 2015

एक खामोश आवाज़ के लिए

                               
                                                          
                               एक अहसास और दूसरा अहसास 
 

क्या कर रहे हो तुम.... 
                           कुछ पढ़ रहे हो... 
सुन रहे हो कुछ... या 
कर रहे हो अपने इस 
दुश्मन से नफरत.... 
 या हो नींद में भी 
 परेशान... तुम्हारी 
 गहरी खूबसूरत आँखों पर 
छाये ये काले घेरे.... 
                           सोते नही हो चैन से... या 
                           रहने नही देते लोग 
चैन से.... क्या 
तुम खुश हो.... क्या 
खुश रहे बीते सभी 
सालों में तुम... 

रात के सन्नाटें में.... 
बादलों से भरा आसमान..... गहरा 
और गहरा रंग..... खामोशी का.... 
                           तेज़ धीरे सरसराती ये हवा..... 
पानी के बुलबुलों से 
                           फूटते बनते और आते जाते 
                           ये ख्याल...... 
 
एक दिन समुंद्र की 
                           टकराती लहरों को 
                           देखते..... एक अहसास 
टकराया दिल के 
किनारों से और आत्मा को 
भिगोता चला गया...... 
सारा गुस्सा सारी नफरत..... 
दुःख और फिर खामोशी में 
                           बदलती चली गयी.... इस तरह 
बीत गए कई साल खामोशी में... 
खामोशी की आवाज़ सुनते 
रात के अँधेरे में  देखते
आसमान में फैले बादल और 
हवा की गुनगुनाहट सुनते हुए.... 
 
उस अहसास से उबरते 
किसी दिन... दूसरा अहसास 
बहा के और दूर ले गया.... 
वो तुम्हारा मुरझाता चेहरा... 
वो सुंदर आँखों के काले घेरे.... 
वो तुम्हारे बनते बिगड़ते 
                           बेचैनी भरे अजीब से रिसते
रिश्ते..... साथी - सपने और 
वो ढेर सारी खड़ी की हुई 
उलझने..... और उलझती हुई.... 
जगाती  होंगी  टाईम बे-टाईम..... 
 
ये इतनी सारी भीड़ जो 
फैली है अपने परायों की..... 
उनका शोर... तुम्हारे मन की 
  खामोशी..... दिन और रात 
कहाँ गए तुम्हारे.... 
उस भीड़ का हिस्सा बन 
                           तुम्हारी बेचैनी बढाने का 
कभी मन नही मेरा.... 
खामोशी से दूर 
चले जाना कही अच्छा है...... 
 
जब कभी आसमान पर 
छाये बादल और चले  हवा 
 तो.... देखना नज़र उठा 
उस ऊँचे आकाश को..... 
भूल जाना सारी भीड़ को.... 
मुस्कराना अपने लिए.... 
बस ऐसे ही...... 
किसी अहसास के लिए.... 
एक खामोश आवाज़ के लिए 
जो तुम सुन न सके कभी.... 
तुम्हारे अपने मन की आवाज़.....!!!
 
27.7.2015/ 3:44 सुबह 
                                  उन गहरी खूबसूरत आँखों के लिए 
 जिनकी मुस्कराहट कहीं गुम हो गई...
          






Saturday, July 25, 2015

लोग परछाईयों में जाते हैं बदल...

                                                      आलाप 
      
                                              जागती रात है और 
                                              खामोश है दिन का 
                                           सफर.... हवा ले रही 
आलाप... मगर धीरे से 
कोइ सुन न ले.... 

लोग परछाईयों में 
जाते हैं बदल... 
समा जाते है 
हवाओं में.... 
कोई दिन नहीं 
रात नहीं 
कोई आहट नहीं.... 
बस सरसराहट है 
पत्तों की.... जो 
सरकते है हल्के से 
हवा के झौंके से.... 
पुकारता है कोई शायद... 
पलट कर देखा 
सिर्फ हवा थी..... 
सिर्फ हवा..... कोई 
आहट नही..... सरसराहट है 
पत्तों की... रात 
बारिश की.... 
भीगती रही चुपचाप यूहीं... 
कोई अंजान सी 
जानी पहचानी आवाज़ 
भीगती रही बारीश में.... 
ख्वाबों में कहीं... तुम्हें 
देखने सुनने की चाह में 
रात की नींद उड़ गई.... 
बिखरे पानी में अक्स 
अँधेरे उजालों के... रातभर 
हवा लहरें बनाती... गुनगुनाती  
बहती रही... और बस कुछ नही 
सरसराहट है पत्तों की... हवा 
ले रही है आलाप.... मगर 
धीरे से.........!!! 

6.7.2015/ 4:06 सुबह