Saturday, February 28, 2015

ओस की बूंदों पर पांव तुम धीरे रखना



अधूरा खत 

मेरे प्यार, 
तुम्हारा खत मिला... 
पर ये 
आज भी अधूरा है, 
जिस दिन 
कहोगे तुम सच 
हाथ बढ़ा कर... 
वो बात 
पूरी हो जायेगी 
जो अधूरी 
छोडी थी हमने 
एक दिन... 
ये खत भी तब 
हो जायेगा पूरा...!!

28.2.2015/ 6:30 सुबह आयी है 
रोशनी की महक लेकर... 
ओस की बूंदों पर 
पांव तुम धीरे रखना!!




जिन्दगी पार कर जायेगी उम्र की दहलीज....

                                                          अकेली

                                                 एक दिन
जिन्दगी पार कर जायेगी 
उम्र की दहलीज,
समय उभर आयेगा 
                                          लकीरों का जाल बन, और 
                                          अपना चहेरा 
खुद भी न पहचान पाओगी, 
                                          छट जायेगी ये भीड़ 
चाहने वालों और 
न चाहने वालों की, 
 
किसी ने कहा 
                                         एक दिन 
कुछ न हुआ तो 
                                         मौत तो होगी हासिल.... 
पर उसका आना 
न हो जो तय 
तो वो भी नही आती, 
साथ के रिश्ते - नाते 
दोस्त - दुश्मन 
बगल से गुजर जाते है 
दूसरी ओर... 
कभी न लौटने के लिए, और 
  सजा देता है भगवान 
उसे अकेले जीने की 
जाने किस पीढ़ी तक
जाने किन अजनबियों के साथ, 
 
एक दिन कुछ भी 
रहेगा न याद तब तुम्हें.... 
  किये हुए फरेब.. 
बोले हुए झूठ... 
बिखराये हुए रिश्ते... और 
जाने - न जाने क्या - क्या, 
 
अच्छा होना और 
नाटक करना 
  अच्छे होने का.... 
फर्क है बड़ा इनमें, 
खैर पड़ेगा नही 
एक दिन इसका भी 
फर्क कोई... पर 
ये बहरूप 
  ले लेगा रूप, 
पुकारने के लिए भी 
होगा न कोई.... 
  उन अजनबियों की 
हैरान भीड़ में, 
 
 कोई दिन 
दिन न होगा, 
कोई रात 
रात न होगी, 
साँझ डूब जायेगी 
अकेली थक कर, और 
सुबह आँख खुलने पर 
अकेली हैरान होगी तुम!!!
 
 
                                               28.2.2015/ 4:30 सुबह है 
                                                        रोशनी की आहट है....  
                                                       चिडियों की आवाज भी है 
                                                       पर थक रही है रात 
                                                       अब चलते - चलते!! 
 
                 
 

Wednesday, February 25, 2015

तुम क्या सोच रहे हो!! आंखे बंद किये नींद के अंधेरों में...



                                रात जागती है 


रात जा रही है 
धीरे - धीरे, 
पीछे मुड़ कर देखना 
क्या और किसे.... 
उजाला अभी आगे है,

सोचतें है बीत रहा है 
हर दिन, हर रोज की तरह..
पलट कर देखा तो 
सब कुछ अलग था,

तुम, तुम्हारी बातें, 
मै, मेरी यादें, 
वो हंसी, वो देखना, 
वो पलटना, वो आँखे मीचना, 
वो चलना, वो रुकना, 
वो सांझ, वो सुबह, 
वो दोपहर, वो धूप, 
वो चाँद, वो हवा, 
वो रोशनी, वो बादल, 
वो गीत, वो धुन, 
वो बज रहा संगीत भी... 
सब कुछ अलग था, 

सर्दियां भी जा रही है, 
धीरे - धीरे सब कुछ... 
हर चीज बदल जायेगी, 
प्रवास पर गये पंछी 
भी लौट रहे होंगे, 

कभी - कभी सोचती हूँ 
रात, दिन में जाती कहाँ होगी,
मानो कही से छुपकर देखती होगी.. 
किसी पर्दे की ओट से 
चमकते धूप वाले सब दिनों को, 
क्या सोचती होगी 
जब देखती होगी दिन को!! 

रोशनी की चमक से 
चौंधियां जाती होगी 
उसकी आँखे, 
  तुम क्या सोच रहे हो!! 
                          आंखे बंद किये 
नींद के अंधेरों में, 

उजाले में तो सपने भी आते नही,
तुम्हारी चहलकदमी 
चौका रही है रात को, 
तुम क्या सोच रहे हो!! 
रात शायद सोचती है 
तुम क्या सोच रहे हो, 

वह अकेली, हर रोज 
बस अकेली 
आसमां देखती... 
शायद गिनती है 
नक्षत्रों को जाने कब से, 
आज तक हो न सकी 
पूरी गिनती, पर वो गिन रही है, 

तुम क्या सोच रहे हो!! 
सो जाओ 
रात अभी बाकी है, 
सुबह आयेगी धीरे से, 
पर रात अभी जागती है 
इसलिए सो जाओ तुम,

दौड़ रहा है मन तुम्हारा 
लोगों की अनजान बातों की भीड़ में... 
कहाँ जा रहे हो.... 
गुम हो जाओगे तुम वहाँ... 
मै यहाँ हूँ, सो जाओ तुम  
रात अभी बाकी है!! 

25.2.2015/ 2:00 रात जागती है 
                                        सो जाओ तुम, 
                                       सब कुछ न सही 
                                       कुछ तो जरुर 
                                       होगा सही 
                                       चाहे धीरे - धीरे!!



Monday, February 23, 2015

I've looked around enough to know That you're the one I want to go through time with


Jim Croce - Time in a bottle - 1973


Friday, February 20, 2015

रोशनी आने दो शाम की आख़री चमक तक

                                       
                                 
                                     हर शाम को 
 

शाम की आख़री रोशनी 
डाल रही है पर्दे 
अपनी खिडकियों पर, 
आख़री चमक तक 
आने दो हवा के साथ 
उसे अपनी 
खिडकियों से अंदर,

दूर तक नजर 
डालने पर देखें तो 
क्या कुछ दिखेगा 
इस शाम के बढ़ रहे 
उसी पुराने धुंधलके में,
कुछ शोर है 
लोगों का..
कुछ आवाज है 
पंछियों की, और 
हवा की लहरों पर 
उडती चीलें लौट रही है 
अपने बसेरों पर,

गुलाब के फूल 
खिलें रहेंगे रात भर 
अपनी डालो पर.. 
उनका सुंदर गुलाबी रंग 
होगा ना फीका 
आने वाले कई दिनों तक, 

पर दिन हर रोज  
यूँही शाम के धुंधलके में 
खोता रहेगा, और 
लौटेंगे लोग अपने - अपने 
उजाले - अंधेरों में,
होगी फिर बातें 
बीते हुए दिन की 
क्या कुछ था और 
क्या कुछ न था, 

हर रोज की तरह 
भागती - दौडती ये दुनियाँ 
और ये दिन 
और ये आ रही रात..
पर शाम को पड़ता 
                            नही फर्क कोई 
वो बस झाँक रही हैं 
अपनी खिड़की से 
देख रही है दिन की 
आख़री रोशनी...!!

20.2.2015 / 6:00 शाम थी 
आँखे बंद किये 
दे रही थी दस्तक 
रात के दरवाजे पर!!





Tuesday, February 17, 2015

धूप थक रही है अलसाई सी दीवार पर टिकाये पीठ देखती है


कोई पहर था दिन का 



धूप की झिलमिलाहट में 
उतर रही थी सर्दी 
धीरे-धीरे सीढियाँ,
पलटती थी रुक कर 
देखती थी पीछे मुड़, 

                          टिटिहाती छोटी चिड़िया 
                        शहतूत की निकलती 
                        बौरों पर घूमती - कूदती 
डाली - डाली चौकती थी 
                        हवा के हर झौंके पर,
 
मैना का झुंड जा रहा था 
दूर खेतों की ओर,
हवा में लगाता कलाबाजियाँ
शैतान कौवों का झुंड 
उड़ा रहा था कबूतरों को, 

देखना दिन को 
बस दिन की नजर से 
बिना घंटों, मिनटों और 
                       एक छोटे से सैकिंड के, 

देखना जाकर आईने को... 
देखता चेहरा मेरा वह 
और मै उसे देखती, 
मै जो पूछती हूँ 
वह भी पूछता वही,
कोई नयी बात नही 
इस बातचीत का 
रुख बदल दे, और 
फिर दिन के बारे में 
क्या कुछ नया कहे... 

चुपके से देखती गिलहरी 
क्या कुछ नया 
बीज - पौधा होगा 
फिर से उखाड़ने को, 

धूप थक रही है 
अलसाई सी दीवार पर 
टिकाये पीठ देखती है 
खेलते बच्चों को, और 
मै सोचती हूँ 
लिखूं कहानी कोई नयी 
कुछ हवा सी रहस्यमयी 
कुछ धूप सी चमकीली, और 
कुछ रात सी खामोश गहरी...
देखते हुए रात को 
रात की नजर से!!



                          17.2.2015 / 3:00 दोपहर थी शायद
या कोई ढलता पहर था 
जो बीत रहा था 
धीरे - धीरे कविता की 
ऊचाई के साथ!! 

Thursday, February 12, 2015

'एलेक्स और लाल टमाटर' कहानी में से


                                अनोखी रेल 
 
                          आओ बच्चों 
 खेले खेल...
 हाथी जिसमे 
 बना हो रेल...
                          चिडियों की हो 
 रेलम पेल...
भालू बैठा लेकर मेल....
मेल? अरे भई
                          चिठ्ठियाँ... चिठ्ठियाँ,
                          बैठा मदारी खेले खेल...
                          धम्म - धप जाती अपनी रेल,
कैसा मजे का है ये खेल,
 
  जंगल, पहाड़ हो...
शेर की दहाड़ हो...
                         चाहे घोड़े करते रेस...
नाचे मोर... अरे 
रस्ता छोड़....
आयी अपनी 
                         मोटी रेल....., मेरा मतलब है 
प्यारी रेल..., कैसा 
                         अनोखा.. अपना खेल,
 
शोर मचाती 
चिड़ियाँ सारी...
                         खेल दिखता 
                         अपना मदारी... 
  टोपी में से... फिर 
निकली व्हेल...
  बोझ से दब गयी 
अपनी रेल... 
                         चीखी चिड़ियाँ 
बंद करो खेल...
टोपी में घुस गई 
 फिर व्हेल,
चल पड़ी फिर से
                         अपनी रेल,
 
पेड़ों की छाँव से....
  बंदरों के गाँव से...
                        जाती अपनी 
                        धम्म - धप रेल,
कैसा अच्छा है ये खेल...
    चलो मदारी खेले खेल...
खेल-खेल में बट गयी मेल...
   सीधी चिठ्ठियाँ भी उल्टी पढ़ती
                        ची..ची..ची..ची...
चिड़ियाँ हंसती,
 
बढ़ गयी गर्मी 
  अब रेल थी थकती...
चलते-चले रुक गयी रेल...
   लाओ नदियाँ 
    लाओ ढेर सा पानी...
                       अब ये रेल न 
आगे जानी...
देख नदिया का ठंडा पानी...
पानी में घुस गयी रेल..
डब-डब डुबकी आधी...
रेल बन गयी नाव सादी,
 
 सारी चिड़ियाँ फिर 
सुर में गायें-
'बादलों की छाँव में...
 मेढकों के गाँव में..
नाव चल पड़ी 
देखो अपनी 
पहन घुंघरू पांव में..... 
छप-छप-छप जाती
अपनी नाव....
थक न पायें 
  उसके पाँव....
  मछली रानी हमसे पूछो 
कितना गहरा 
नदिया का पानी'
 
गाती जायें चिड़ियाँ सारी
चलती जाती नाव प्यारी....
 रेल को मिल गई 
                      ठंडक देखो..
                      हंसकर बोली सबसे देखो-
 'काफी हो गयी सेल हमारी 
अब बन जायें फिर से रेल'
                      बाहर निकल आयी 
अपनी रेल..
बड़े मजे का था ये खेल,
धम्म - धप बढती जाये रेल 
चलता रहा ये 
दिनभर खेल,
आओ बच्चों खेले खेल!!




Friday, February 6, 2015

उन सभी अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जो ढूढ़ रहे है नयी दुनियाँ



                         कई चाँद-तारों की दुनियाँ 


जादू सी है ये दुनियाँ
हर पल बदल रही है,
नींदों में है ये सपने 
या सपनों की है ये दुनियाँ,

इक दूर है कोई दुनियाँ 
कई बादलों के ऊपर,
कई आसमां के पीछे 
कई चाँद-तारों की दुनियाँ, 

कोई रात, दिन तो होता 
कोई दिन, चाँद वाला 
कोई आसमां तो होता 
इक नम जमीं वाला,

इस कारवां को देखो 
कितने है जाने वाले,
जो ढूढ़ते है दुनियाँ 
इक नयी जमीं को पाकर,

जो उजाड़ते है हमको 
सपने दबा के सारे 
हम बीज है अनोखे 
फिर उगेंगे देखो 
लेके रूप हजार न्यारे!!

11.1.2015 / 1:45 दोपहर