Monday, January 26, 2015

बदल रहा है मौसम और जिन्दगी में इक नम खुशी है


                             एक बारिश नींद की 
दिन रहा कल 
बारिश का सारा
ढेर छतरियों वाला,
भीगता रहा शहर...
सड़क का हर कोना,
रात आज है 
गहरे आसमान वाली,
उड़ते पंछी जा रहे 
प्रवास पर कही..
दिशा दिखाता चाँद भी 
चुपचाप देखता उन्हें 
जाते कही दूर, 
उदास नज़रों से था 
देखता उन्हें, सोचता 
क्या था वो, पर
जाता नही कही,
संगीत गहरा और 
गहरा होता गया,
शायद जागता है 
कोई रात के साथ,
भीगे शहर की 
झिलमिलाती रोशनी 
बनाती है पानी में 
कई तस्वीरें,
रोशनी की आहट से 
पहले सो जाना चाहिए 
चिड़ियों की चहचहाहट
जगायेगी फिर मुझे,
शायद आज भी 
भीगेगा शहर,
ठंड से कांपते हाथों में
गर्मी अभी बाकी है 
पर आँखें हो रही 
नींद से भारी,
सपनों की कुनमुनाहट 
सुनायी दे रही है,
एक बारिश नींद की  
रोशनी होने तक 
ले लें अभी!!
  23.1.2015 / 4:50 सुबह 




Thursday, January 22, 2015

THE BRIGHTER SIDE OF LIFE

                                  रुनटून 
 

रूनटून!! हाँ, यही नाम है उस छोटी सी, प्यारी सी और बहुत ही ज्यादा प्यारी सी बिल्ली का! वो खेलती-कूदती और गाती-फुदकती चलती थी! उसका दरसल कभी कोई नाम नही था! उसे कुछ याद नही कि उसके माँ-पिताजी कहां है और कौन है?? कोई पूछता भी नही था, किसी को कोई मतलब भी नही था! हाँ, पर जब किसी ने उससे पूछा कि तुम्हारे माँ-पिताजी कहाँ है?? तो!!! बस, यह सुन रुनटून की प्यारी और सुंदर मोटी-मोटी आँखों में से 'ये मोटे-मोटे' आंसू निकल आते और वो मासूम सा चेहरा बना कहती- 'मुझे नही मालुम.... मै अकेले रहती हूँ.... सर्दी में...... गर्मी में.... और बारीश में भी.... बिलकुल अकेले.... मुझे कोई प्यार नही करता.... और मुझे बहुत जोर से भूख भी लग रही है!'

यह सुनते ही बस पूछने वाला उसे खाने को दे देता! ऐसे ही दिन निकल रहे रहे थे, और तकरीबन कोई न कोई उससे दिन में एक-दो बार पूछ ही लेता था! इसलिए खाने की उसे कभी चिंता नही होती थी!

पर, सच में रुनटून अकेले ही रहती थी! कभी किसी पेड़ की खो में छुप कर, कभी छत की परछत्ती में छुप कर या किसी पेड़ की घनी डाल में छुप कर वह सोती थी! वो दिनभर यूँही इधर-उधर भटकती घूमती रहती थी! रात में आसमान से बाते करती और दिन में तो जो भी रास्ते में मिल जाता उससे बातें करती, यहाँ तक कि पेड़ पौधों से भी बातें करती हुई चलती! सोने से पहले तो खासतौर से पेड़ से कहती थी - 'देखो पेड़ बाबा, जब मै सो जाऊं तो मुझे नीचे मत गिराना और मेरा ख्याल रखना......' और न जाने क्या-क्या वह पेड़ से कह कर सोती थी!


पर अक्सर वह एक गाना गाती हुई घूमती थी! हाँ थोड़ा बहुत कभी-कभी शब्दों का बदलना होता रहता था पर गाना वही होता था जो वो रोज़  उछलती-घूमती, फुदकती-झूमती गाती थी और आज भी वह गाती हुई जा रही थी -

                  

Wednesday, January 7, 2015

'जिगोलो' कहानी - चलो, चले, चल पड़े हम.. फिर से यहाँ....



                              आसमां है बना 
 
मेरा आसमां बना है 
तेरा ही जहां-
भीगा है मन - भीगा है ये तन....
आँख की नमी बनी गीला आसमां-
जहाँ हम मिले थे....
फूल थे खीले वहाँ...
पाँव जब टिके ज़मी पर 
हो गये सब धुआँ....

धीरे से...... धीरे से.....
मौसम ने.... धीरे से -
दी थी आवाज़, पर 
होश था किसे - कहाँ...
होश.. आने तक 
बढी थी दूरियाँ... दरम्या,
हम.. चले थे फिर किधर...
कोई जाने न...

भीगा है मन - भीगा है ये तन.....

दिन ज़िन्दगी सा था...
खिलाखिला धूप का रंग,
मौत रात नींद थी...
सुबह... नया जन्म हुआ-
और ज़िन्दगी बढी कही...
फिर वही दो कदम 
चले है फिर यहाँ-
कोई कहेगा यहाँ क्या.... 
चलो, चले, चल पड़े हम 
फिर से यहाँ....

मेरा आसमां बना है...
तेरा ही जहाँ...
 
 7.1.2015 / 04:06 शाम 
  
'जिगोलो' कहानी में से, जिसका नायक केदार कशमकश में सही 
निर्णय नही ले पाता और प्रभा से दूर होता चला जाता है...