Wednesday, December 31, 2014

कहानियाँ बनती हैं....


स्पिंस्टर हाउस 

अंधेरा फैल चुका था, मगर आसमान में एक भी तारा नजर नही आ रहा था! हवा से हिलते पत्तों की सरसराहट साफ-साफ सुनायी दे रही थी! कुछ घरों में अभी भी रोशनी थी! दूर एक घर में रोशनी है! देर रात गये कई घर जागते रहते है! उनके दरों दीवारों को भी जल्दि नींद नही आती!

धम्म-धम्म और बीच-बीच में टन-टन की आवाज़ आ रही है, लगता है कोई हमाम दस्ते में कुछ कूट रहा है! अंधेरे को चीरती हुई, हवा के साथ बहती हुई यह धम्म-धम्म की आवाज़ इसी घर से आ रही है! घर के अंदर कही कम कही ज्यादा रोशनी है! संगीत की धीमी आवाज़ भी आ रही है!


'बूआजी, दूध!' संध्या दूध का गिलास रखते हुए बोली!

एक बूढी औरत चौकी पर किताब रख पढ़ रही थी या न मालुम देख रही थी! संध्या की नजर बूआजी की किताब पर पड़ी जिसे की वे बड़े गौर से पढ़ रही थी या फिर देख रही थी और साथ ही अपनी माला भी जप रही थी! बूआजी ने पल्लू से अपना सर भी ढका हुआ था! माला जपते हुए वे बीच-बीच में गहरी सांस भी ले रही थी! संध्या के आने पर वे उस पर ध्यान नही देती है बस एकटक किताब देख पढ़ रही है!

पर किताब पर नजर पड़ते ही संध्या के होटों पर मुस्कराहट आ गयी और वह मुस्कराती हुई कमरे से बाहर चली गयी! बूआजी बड़े गौर से के. एल. सहगल की जीवनी पर लिखी किताब पढ़ रही थी! वह किताब बूआजी यानी पदमा देवी को किसी रामायण या गीता से कही ज्यादा प्यारी थी! कमरे में लगी बड़ी सी के. एल. सहगल की तस्वीर उनके इस अथाह प्रेम को दर्शाती है, और अक्सर ऐसा ही होता था कि पदमा देवी उठते-बैठते, चलते-फिरते उस तस्वीर को बड़े गौर से देखती और लम्बी गहरी साँस छोड़ कर आँखे बंद कर लेती!


संध्या के कमरे से बाहर जाते ही पदमा देवी ने सर पर से पल्ला हटाया और रिकार्ड की आवाज थोड़ी ऊँची कर दी, जिससे अब उसमे से आ रहे गाने के बोल साफ-साफ सुनायी देने लगे थे, '....रूही-रूही, रूही.....मेरे सपनों की रानी, रूही.......!' पदमा देवी ने पीछे सहारा ले आँखे बंद कर ली!


अरे भई, वो सोई नही थी, वो बस कुछ सोच रही थी! वो बस कभी-कभी बस ऐसे ही सोचती थी, शायद पीछे छूट गयी किसी बस के बारे में, मुझे लगता है उन्हें वो बस पकड़ लेनी चाहिए थी, पर उन्होंने पकड़ी नही!!!! शायद इस्सी लिए, मेरा मतबल है इसी लिए वो अक्सर ऐसे ही बस सोचती रहती थी!


जवानी के दिनों में खासी (ध्यान दे यहाँ खासी और गोरा जनजाती की बात नही हो रही) सुंदर महिला रही हैं! काफी और एक कप चाय, हाँ तो काफी पढ़ी लिखी हैं और पढाती भी थी, औरर जब तक आँखों में चमक, चाल में दमक औरर बालों का रंग जेट ब्लेक यानी काढ़े जैसा काला था तब तलक(महमूद) के.(डॉट) एल.(डॉट) सहगल के अलावा किसी का ख्याल नही आया और समय बीत जाने पर छैल-छबीले मर्दों को उनका ख्याल नही रहा और वे बूढी हो गई! पीराब्लेम यह हुई के बालों को रंग कर भी कुछ न हुआ!!! सहगल साहिब की फिल्मों की तरह पदमा देवी की लाइफ भी बलेक एंड बाईट हो कर रह गई! आफ-सोंस क्या करना उन्होंने अपनी लाइफ की चटनी नही बनाई यही शुक्र (शनी सारे ग्रह और उप-गृह बच गये) है!



Friday, December 26, 2014

गाछेर बाड़ी - एक बैरागी का गीत



                                                     बैरागी 

                                         इक बैरागी 
                                    रोज़ था जाता -
                                    इक गीत वो 
                                    हर पल गाता,
                                    हर पंक्ति में यह 
                                    गाता - जाता ......
                                    'ओ निर्दयी, तू कैसा विधाता....
                                    मै माटी, मै माटी 
                                    तू अंबर दाता - 
                                    मै बैरागी गाता जाता.....
                                    न मै समझू..... रात - अँधेरा 
                                    दिन का उजारा 
                                    कब है छाता....
                                    हाथ फैलाये मै हूँ गाता,
                                    मै मांगू - तू है दाता..
                                    समय का खेल 
                                    ये कैसा जाता...
                                    ओ निर्दयी, तू कैसा विधाता.....
                                    मै बैरागी गाता जाता......'
                                    इक बैरागी रोज़ था जाता......!! 
  
  
यह गीत 'गाछेर बाड़ी' उपन्यास में से लिया गया है! इस गीत में उस बैरागी की भक्ती है प्रभु के प्रति, पर उपन्यास की नायिका मणिमाला बैरागी के गीत में अपने दर्द की छाया देखती है....

परी-लोक : राजाओं की घाटी की रहस्यमयी दुनियाँ, तूतनखामन


परी-लोक 2 
 
रेत के वीरानों  में 
 रात-दिन उडती-घूमती 
हवा क्या ढूँढती थी भला,
क्या खोजती थी.....
                              किसे थी ढूँढती भला!!!
 
गुजरते काफिलों को 
                              देखती हसरत भरी 
नज़रों से थी पूछती,
                              कोई सुन पाता उसे....
 
                             पुरातत्ववेत्ताओं को सुनती 
उनके औजारों को टटोलती...
उनकी खोजों में खोजती 
                             किसे थी खोजती!!!
                             कौन था जिसके लिए 
                             यूँ थी भटकती,
 
रेगीस्तान में बसंत कहाँ
पर एक बसंती हवा 
     थम गयी, बस एकटक 
                             देखती नज़रें खुलते 
उस दरवाज़े को,
 
                            खोल रहे थे जिसे 
  पुरातत्ववेत्ता अपनी बरसों की 
                            अथक मेहनत के बाद,
राजाओं की उस घाटी में 
                                 ढूँढ़ते एक राजा को,
 
खुला वो दरवाज़ा 
धक से लौटी धडकन 
हवा के सीने में, और 
वह तेजी से बढ़ी
सबसे पहले उस मकबरे में,
 
 हैरान नज़रों से थी देखती 
                            उस रहस्यमयी दुनियाँ को, 
 टटोलती किसी पुरानी 
सदियों पुरानी याद को,
 
  हाँ, शायद यही तो थी 
 वह पुरानी याद जिसे थी 
                            वो खोजती इस वीराने में
राजाओं की इस घाटी में,
रहस्यमयी दुनियाँ में 
                            दबे रहस्यों को सुनती 
देखती उस परी-लोक को,
 
 लम्बी सांस भर 
लौट आयी बाहर... 
उड़ चली फिर कही ओर
                           इन वीरानों से दूर 
                           किसी और परी-लोक की 
 भूली हुई खोज में!!!
 
                                  18.12.2014 / 5:44 सुबह 

Friday, December 19, 2014

खिलते चैरी के फूल कहते है हमसे जीवन क्षणभंगुर है पर सुंदर है


                                 परी लोक - I 

हवा थम गयी -
सब रूक सा गया,
सांस रोके एकटक
देखती हवा....
बस एकटक....
अपनी धडकन सम्भाले 
बस देखती रही
अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से,
फूलों से पटे हुए शहर को,
चैरी के फूल थे, फिर 
ली एक लम्बी सांस 
धक से धड़का उसका दिल, 
फिर अपनी बाहों को 
फैलाये घूमी हवा,
घूमती रही, बस घूमती रही,
फूल हवा के साथ बिखरते रहे-
बस बिखरते रहे.....
ढक गयी ज़मीन
फूलों से, और 
वह चहलकदमी करती
और उडती-घूमती रही दिनभर, 
सब कुछ सपना सा था,
ऐसा कुछ पहले 
न देखा था कभी,
मानो हो कोई जैसे 
.......... परी-लोक!!

                                  18.12.2014 / 5:36 सुबह