Sunday, November 30, 2014

एक अधूरी याद : मानो पिछले जन्म की बात हो

                                                 

 

                                  मै कहाँ हूँ 
 
 क्या आज भी 
  करते हो तुम वैसे ही 
                                बहकी - बहकी बाते,
  चलते - चलते 
                               लड़खड़ाते है कदम तुम्हारे,
 
देखते हो पलट कर...
   हंसते हो आँखे मीचकर, फिर 
                               मेरा देखना कही ओर 
                               करना अनदेखा तुम्हे...
  और तुम्हारा खिलखिलाकर 
हंसना..फिर चलना 
वैसे ही अपने ही कदम
                               गिनते हुए और बोलना 
बीच - बीच में कुछ और,
 तुम्हारी वो बातें...
कुछ उटपटांग 
   कुछ फूलों की, तितलियों की,
ट्रैफिक की, आसमान की और 
                               न जाने क्या - क्या,
 
       फिर अचानक कहना 
 होगा कोई पागल 
जो करेगा तुमसे प्यार,
 देखना एकटक...
 फिर मीचना वैसे ही 
अपनी आँखों को और 
हंसना खिलखिलाकर और कहना 
    मेरा भी दिमाग 
है खराब... पिछले जन्म से,
पलट - पलट कर देखना 
    मै कहाँ हूँ,
 
बरसों बाद कही 
      कुछ नही बदला और 
    कही अंदर सब कुछ 
                            गया बदल....कुछ न बचा,
                            यादें ढक गयी 
     नयी यादों से,
     प्यार ढक गया 
                            नये प्यार से, पर 
    आँखे मीच कर वैसे ही हंसते हुए 
  क्या तुमने पलट कर 
     फिर देखा कभी
 मै कहाँ हूँ......!!!
 
                              29.11.2014 / 5:26 सुबह

Thursday, November 20, 2014

रोशनी ही बस सुनायी पडती है

 
उन खिडकियों के पीछे 
 
जाने कब से 
एक अजीब सा हाल 
रहा है मन का....
गुजरते हुए किसी राह से,
  अजनबी घरों को देख 
 अजब सा ख्याल रहा मन में,
कौन रहता होगा इनमे?
 
                             बंद खिडकियों के पीछे 
कौन जागता - सोता होगा,
 पलटता होगा या होगी पन्ने 
किसी किताब के,
महक आयी वही पुरानी 
किसी ने बघार दी दाल में,
 
कौन सुन रहा है 
                             यह पुराना रिकार्ड,
बच्चा भूख से रोता है या 
 आ रही है उसे नींद,
फोन पर कर रही है बातें या 
अपने आप से करती है बातें, पर 
हंसी बहुत प्यारी है,
और न जाने, जाने 
क्या - क्या और 
कैसी - कैसी आवाज़े
और ख्याल बेशुमार,
 
शहर अपना हो या 
अजनबी, पर 
शहर - शहर है, पर 
अब सुनायी कुछ 
 देता नही तो ख्याल 
 भी नही आते, पर 
 ख्याल बहुत ख्याली होते है, 
 
                             अब शहर ऊँची उठती 
दीवारों में बसने लगा है,
रात में खिडकियों से झिलमिलाती 
 रोशनी ही बस सुनायी पडती है,
कागज का बनाऊ मै एक हवाईजहाज और 
 उड़ जाऊ हवाओं की लहरों पर 
 हिचकोले खाता उड़ता रहे ये जहाज,
 
भेजूं रेडियो की तरंगो पर या 
एक टेलीग्राफ संदेश -
टीक ...टीक ... टीक.. टीक...
 जवाब आये तो सही,
बताये कोई चाहे कैसे भी,
 चाहे तो भेज दे जवाब 
 मोस कोड में,
 
                             कौन रहता है -
शहर - शहर में 
घर - घर में ....
 झांकता है बंद खिडकियों से!!
 
26.8.2014 / 2:40 सुबह 

Monday, November 3, 2014

अच्छो को बुरा साबित करना दुनियां की पुरानी आदत है


                                     रूट न. 56


सफदरजंग पर बस रूकी, बस स्टैंड से सवारियां बस पर चढने लगी! तभी एक लडकी ने ऊची आवाज मे कंडक्टर से पूछा-
'ए कंडकटर बस केनाट पलेस जायेगी क्या?'
कंडक्टर जोकि रस्सी खींच कर बस चलवाने वाला ही था कि उसने लडकी को बस में चढने का ईशारा किया! उस पूछने वाली पहली लडकी ने दूसरी लडकी से कहा-
'ए रूपा चल बस जायेगी!'
दोनो बस पर चढ गई!
'दो टिकट दे दो केनाट पलेस के!' वही लडकी फिर बोली!
पचास का नोट देखकर कंडक्टर ने पूछा-
'क्या खूल्ले पैसे नही है?'
'नही, तू ही दे दे!' वह लडकी फिर बोली!
'अच्छा लाओ!' कंडक्टर ने नोट लेकर टिकट दे दिये!
बस में कोई सीट खाली नही थी! दोनो लडकियाँ खडी हुई आपस मे बात करने लगी! कंडक्टर उन दोनो की बाते सुन रहा था! उनकी बातो से लगा कि वे दोनो मेह्न्दीवालियाँ है और एक का नाम कंचन है और दूसरी का नाम रूपा! रूपा सुंदर थी और उससे ज्यादा सुंदर उसकी हॅसी थी! कंडक्टर  एकटक रूपा को देख रहा था! फिर एक ओर स्टैड आया बस रूकी एक सवारी उतरी कंचन बैठ गई! थोडी देर बाद कंडक्टर की बगल मे बैठा आदमी भी उतर गया! रूपा वहाँ आ कर बैठ गई! कंडक्टर ने उसके बैठते ही एक गहरी सांस ली!

जाने कौन सा तेल है........शायद चमेली का ही तेल है, पर नाम तो इसका रूपा है.....सावली है, पर प्यारी है! कंडक्टर सोचे जा रहा था! फिर वह खिडकी के बाहर देखने लगा, पर अब रूपा उसकी तरफ देख रही थी! अचानक कंडक्टर ने पलट कर रूपा की तरफ देखा, रूपा चौक गई पर कंडक्टर मुस्करा दिया! रूपा झेप गई! बस चलती, स्टैड आते बस रूकती, लोग चढते और उतरते रहे! वो दोनो ही आँखो के किनारों से एक दूसरे की तरफ देखते ! 

'ये रूट बडा ही लम्बा है, बस चलती ही जा रही है रास्ता खत्म ही नही होता! लगता है जैसे मानो कई घंटो से इसमे बैठे हों!' आगे की सीट पर बैठा एक आदमी दूसरे से बोला!

बस रीगल की लाल बत्ती पर रूकी! कंचन ने चिल्ला कर कहा-
'रूपा रे... चल उतर जल्दि!'
रूपा जल्दि से उठी और तेजी से उतर गई! उतरते हुए उसने कंडक्टर की तरफ देखा! कंडक्टर धीरे से मुस्कराया! रूपा के चहरे पर भी मुस्कराहट आयी! कंडक्टर ने खिडकी से बाहर झांक कर देखा! दौड कर दोनों लडकियाँ पटरी पर चढ गई! रूपा ने पलट कर बस की तरफ देखा! वह धीमे से फिर मुस्करायी कंडक्टर भी मुस्कराया! बस आगे बढ गई!