Friday, October 31, 2014

यादें गुम हो जाती हैं और समय बीत जाता है, किसी को कुछ फर्क नही पड़ता...


                                    सलीम                  



आसमान में बादलों का कोई नामोनिशान नही था! सर्दियाँ जा रही थी! दोपहर में गली में कोई नजर नही आ रहा था! सलीम धीरे धीरे गली में  आगे बढा जा रहा था! रिक्शेवाला घंटी टनटनाता हुआ आगे बढ गया! इतने बरसो में काफी कुछ बदल गया था!

'बदलेगा ही बीस बरस काफी है कही भी कुछ भी बदल जाने के लिए!' सलीम को ख्याल आया और फिर उसके ख्याल रुके नही!
'सुजाता क्या आज भी वहाँ रहती होगी......कहाँ, अब तक तो उसकी शादी हो गई होगी!' जाने क्या सोच सलीम सुजाता के घर की ओर चल पडा!
सुजाता का घर एक गली छोड कर था, बल्कि कहा जाये तो सलीम के पुराने घर से बिलकुल उल्टि दिशा मे था! पर सलीम बस्ता लिये उसी गली से घर की ओर लौटता था! रोज सुजाता खिडकी से बाहर झाँक रही होती थी! शायद सलीम को ही देखती थी! ये दोस्ती थोडी अलग सी थी! ये दोस्ती थी बेर, अमबरक और ईमली के कच्चे कटारो की! जो सुजाता को थमा सलीम आगे निकल जाता था! दोस्ती भी शायद ऐसे ही हुई थी उन दोनो की! स्कूल छूटा था! बच्चो की भीड दौडती, धकयाती चल रही थी!
एक धक्का आया और सुजाता नीचे गीर गयी! दौड कर सलीम ने उसे उठा दिया! वो रोने लगी! उसके हाथ का दोना नीचे मिट्टी में गीर गया!
'अरे उसे मत उठाओ गंदा हो गया है, लो ये मेरा ले लो!' सलीम बोला!
सुजाता ने सलीम की तरफ देखा और दोना ले लिया! उसके शायद घुटने में चोट लगी थी! ठीक तरह से नही चल पा रही थी! सलीम ने आगे बढ उसका बस्ता ले लिया और उसका एक हाथ थाम उसके साथ चलने लगा!
'कहाँ है तुम्हारा घर?' सलीम ने पूछा!
सुजाता ने हाथ से गली की ओर ईशारा किया! सलीम ने सुजाता को उसके घर तक पहुचा दिया!
दरवाजे पर पहुच सुजाता ने पलट कर सलीम से पूछा- 'तुम्हारा नाम क्या है?'
'सलीम!' सलीम थोडा अकड कर बोला!
'सुजाता...मेरा नाम है!' सुजाता खुद ही बोल पडी!
'अच्छा नाम है, पर इसका मतलब क्या होता है बताओ तो!' सलीम ने पूछा!
'मालुम नही!' सुजाता ने भोलेपन से कहा!
'अच्छा तू जा, दूध में हल्दि डाल कर पी लेना, चोट ठीक हो जायेगी!' इतना कह सलीम हाथ हिला कर आगे बढ गया!
ये थी उनकी दोस्ती की शुरुवात!

एक पुरानी कहानी... एक याद चीड़ के पेड़ों सी


                                           गंदा भेड का बच्चा
  
सुबह सुबह नानी ने मुझे जगाते ही बताया कि नाना मेरे लिए कुछ लाये है!
'पहले बताओ क्या लाये है,.......बताओ न......नानी!' मैने कम्बल मुँह के ऊपर से हटाकर कहा!
'नही-नही, पहले उठो, नाना बाहर बुला रहे है!' नानी कंधा थपथपा कर बाहर चली गयी!
'तुम क्यो हर बार इतना कंधे पर मारती हो, चपटा कर दोगी!' मै कम्बल फैक पलंग से कूदता हुआ बोला!

'माँ...ये क्या है.....बकरी का बच्चा है?'
मै एक छोटे से भेड के बच्चे को देख बोला! पर माँ के बोलने से पहले नाना अपनी टोपी ठीक करते हुए बोले-
'नही, ये भेड का बच्चा है........तुम्हारे लिए लाये है!'
यह सुन मै बहुत खुश हुआ! मै उस बच्चे को प्यार करने के लिए जैसे ही उसे गोद मे उठाने लगा तो वो भेड का बच्चा उछल पडा और मै पीछे गिर गया! वो भेड का बच्चा उछल कर भागा और मै अपने कपडे झाड उठ खडा हो सबका चेहरा देखने लगा! सभी हँस रहे थे—माँ, नाना, नानी, खेत मे काम करने वाले सभी! सबको हँसता देख मै भेड के बच्चे के पीछे भागा! वो आगे-आगे और मै पीछे-पीछे! पर वो हाथ कहा आने वाला था! पर अचानक वो भेड का बच्चा रुका और मेरी तरफ पलट कर दौडा! उसे अचानक अपनी ओर आता देख मै डर गया! वो अपना सर आगे की ओर झुका कर आ रहा था! फिर क्या था, डर कर मै आगे-आगे और वो पीछे-पीछे!

'माँ ..माँ.. बचाओ-बचाओ, इस गंदे भेड के बच्चे से!' मै माँ की गोद मे चढ कर बोला!
 'हा..हा.. (नाना ने हॅसते हुए मुझे माँ की गोद से उठा अपनी गोद मे ले लिया और बोले)...ऐसे डरते नही है, देखो खाडू के बच्चे को ऐसे कानो से पकडते है! ( नाना ने मुझे गोद से उतारा और उस गन्दे भेड के बच्चे को उसके कानो से पकड उसका सर नीचे कर दिया ) देखो कितना आसान है, आओ पकडो!' 
मैने आगे बढ उसके कान पकडे और उसका सर जैसे ही झुकाया उसने अपने को झटका दे अपना सर मेरे पेट पर मारा और भाग गया और मै जोर जोर से रोने लगा! यह थी हमारी पहली मुलाकात! मै उस समय चार साल का था और वह दो - ढाई महिने का!
  

Tuesday, October 14, 2014

एक प्यारे बन्दर के लिए



                                     एक शैतान बन्दर का गीत
 

भारी भरकम, थे सब हाथी ..... 
रोज ही पढ़ते .... एक ही पाती ....ओहो ..
चिड़ियाँ खाना रोज है ....खाती,
न वो पढती - न वो गाती,
छुट्टी से पहले उड़ जाती .....
मास्टरजी को गुस्सा आती ....
बन्दर सारा शोर मचाती .....
कैसा गाना हम सब गाती ....
नौ का पहाड़ा भूल गये हम ....
दो का पहाड़ा नही है आती ....
मास्टरजी को गुस्सा आती ...
बन्दर सारा शोर मचाती .....

डोसा बन्दर का ये गाना 
सुन कर हो गया ... हाथी दीवाना ...
बोला हँस कर ..... फिर से सुनना 
मिलकर गाये फिर ये गाना ........

'जिसमे हाथी सारे खाती ...
कभी वो आती - कभी वो जाती ....
मिलकर सारे रेस लगाती,
बन्दर जिसमे शोर मचाती ...
मास्टरजी को गुस्सा आती ....'
हँस कर फिर उछला हाथी,
बड़े मजे से था वो - गाती,
इससे पहले पीटे मुझको 
हम तो बाबा यहाँ से जाती .....
मै हूँ बन्दर - वो है हाथी,

डोसा को जाते फिर देख 
गाने पर लग गया ब्रेक,
रोक कर रस्ता हाथी बोला .....
..वेट...वेट..वेट..वेट...वेट......
'प्यारे बन्दर किधर को जाती ...
हम भी पीछे - पीछे आती .....'
आगे बन्दर - पीछे हाथी -
इधर को जाती - उधर को जाती .....

सारी चिड़ियाँ शोर मचाती -
सारा जंगल ये गाना गाती ...
प्यारे डोसा ये क्या गाती ...
हम सब जंगल के साथी ...
आओ हम सब मिलकर गाती ....
'काला बादल - नीला हाथी 
अरे, पीली चिड़िया उडती जाती ...
मोटी - मोटी बूंदे जब गिरती ...
छम - छम - छम देखो बारीश आती ...'

पर बिन छतरी के सारा जंगल ...ओहो ..
भाग कर देखो सब छुप जाती ...!!! 


                                        25.7.2014 / 2:20 दोपहर

Friday, October 10, 2014

भरी बज्म में राज़ की बात कह दी..बड़ा बे-अदब हूँ सजा चाहता हूँ


    बहरूपिया
  
       खेल खत्म होने पर 
गिरेगा पर्दा.....
नाटक दिखा बहरूपिया 
आयेगा फिर एक बार 
मंच पर.........
झुकायेगा सर......
बजेंगी तालियाँ.....,

मुखौटा पहने 
दिखाता खेल,
रोता मुखौटा......
हसंता  चेहरा अंदर,

बजती रही तालियाँ......
रोते मुखौटे पर 
एक भी मुस्कराहट नही,
पर अंदर  चेहरा खुश है.....
वाह! कितना रुलाया उसने,

पर खेल खत्म हो गया....
                                 दर्पण के सामने 
उतरता मुखौटा....
चेहरा निकल आया...
खेल खत्म होने पर 
हर मुखौटा उतर जाता है,

पर आज वह हैरान है -
हैरान है दर्पण में देख, 
लगातार खेलते रोने का खेल 
उसका चेहरा भी 
मुखौटे जैसा हो गया,

उसकी आत्मा उतर आयी 
मुखौटे पर..... और 
मुखौटे ने अपना रूप लिया
उसके चेहरे  पर,
बहरूपिया रूप बदलेगा क्या?

उसकी हंसी - उसका अहम् 
गुस्से में बदल गया,
नफरत से भर 
मुखौटा दर्पण पर पटक 
वह चिल्लाया ....
झूठ है - झूठ है सब ....
बिखर गये टुकड़े 
बहरूपिया हैरान 
देखता रह गया,

हर टुकड़े में वही चेहरा....
सिर्फ चेहरे ही  चेहरे ...
रोता चेहरा बहरूपिये का,
क्रोध से और चिल्लाता बहरूपिया
झूठ है - झूठ है सब....
हर टुकड़े से आती दिखती 
एक ही आवाज -
झूठ है - झूठ है सब!!!

                                              24.9.2014 / 3:40 ढलती दोपहर 

कितना बड़ा है दुनीयाँ का घेरा, लोग दिलों से मिलते नही हैं


                                                 वेटिंग रूम


लगता है ये पूरी दुनियाँ ही वेटिंग रूम है...... आप इंतजार करते है ...... इंतजार???.. हाँ इंतजार ही तो करते है ..... कभी इंतजार पूरा होता है और कभी यूं ही छोड़ कर जाना पड़ता है.........

उसने अपने मन मे आते - जाते इन ख्यालों को बीच में छोड़ा और दिवार पर लगी घड़ी पर निगाह डाली! अभी भी तीन घंटे बाकी थे छ: बजने मे! स्टेशन पर गाडीयां आ जा रही थी मगर शायद यहाँ रूकती नही थी, पर उनका छोड़ा हुआ धुँआ वहाँ रुकता था ......... और वह वो धुँआ महसूस कर रही थी! स्टेशन की अपनी लाईट थी वरना रेल की पटरियों के उस पार काफी अंधेरा था! दरवाजे पर खडी वह उस अंधरे मे जाने क्या देख रही थी! प्लेटफार्म पर दूर - दूर तक कोई नजर नही आ रहा था!

हल्की - हल्की हवा चल रही थी! उसके बाल हवा से उड़ते और फिर उसके चहरे से चिपक जाते! वह उन्हें हटाती, फिर हवा से उड़ते फिर वह उन्हें हटाती! हवा का चलना और बालो का उड़ना और उसका उन्हें हटाने का सिलसिला चलता रहा!

वह धीरे - धीरे प्लेटफार्म पर चहलकदमी करने लगी! तभी किसी की आहट पर उसने मुड़ कर देखा! स्टेशन मास्टर थे! उम्र यही कोई पचास - एक होगी!

समय : ये न होता तो क्या होता

                                    दो प्यारे अजनबी  

                                 अगर  मै रोक लेती 
                                 समय को, उस 
                                 चाय के प्याले में.... जो 
                                 बढ़ाया था तुमने 
                                 मेरी ओर, अगर 
                                 मै समेट लेती 
                                 समय को, उस 
                                 छोटी सी बात में..... जो 
                                 लम्बी होते - होते 
                                 रह गयी कही, अगर 
                                 मै थाम लेती 
                                 समय को, उस 
                                 पल में जहाँ 
                                 शरारत थी तुम्हारे
                                 चहरे में, अगर 
                                 मै बढ़ कर छुपा लेती 
                                 समय को, उस 
                                 दिन जहाँ बिना बोले 
                                 लड़े थे हम 
                                 खामोशी से, तो हम 
                                 आज इतने अजीब से न होते.....

                                  पर अगर कुछ 
                                  और होता, कुछ 
                                  ऐसा न होता, कुछ
                                    नया सा होता, अगर 
                                    हम कभी मिले 
                                    ही न होते, कभी बस ....
                                    गुजर जाते किसी  
                                    भीड़ में एक - दूसरे की 
                                    अगल - बगल से,
                                  शायद ये ज्यादा 
                                  होता अच्छा, अगर 
                                  मै बचा लूं समय को 
                                  लौट कर अतीत में.....
                                  हम दोनों के लिए....

                                  बीते हुए सभी दिन... हफ्ते... 
                                  महीनों और सालो को 
                                  बचा लूं........ मै यदि -
                                  मै कही पीछे लौट कर, और 
                                  हम खुश रहे अपनी - अपनी 
                                  दुनीयाँ में, और यूही 
                                  गुजरते रहे कही न कही 
                                  ख्यालों में किसी भीड़ में, 
                                  हम दोनों, भीड़ की 
                                  लहरों में बहते 
                                  गुम हो जाते.....
                                  दो प्यारे अजनबी!!!!!

                                       9.10.2014 / 5:50 शाम