Sunday, March 23, 2014

two for the road : कभी - कभी, कैसे - कैसे ख्याल आते है


 
 परी हूँ मै 
 

 मै आज भी 
 दौडती हूँ ....ख्यालों में,
 पूरे घर में 
 अपनी बाहें फैलाये,
 'परी हूँ मै..
 दूर आसमान की....',
 ये कहते हुए,
 
 बाहें ऊपर - नीचे हिलाते हुए,
 अपने पंखों में 
 हवा भरती हूँ,
 मेरे आसमान में 
 होते है - एक सौ चाँद, और 
 एक सौ करोड़ तारे,
 
 झिलमिलाते है वो 
 दिन और रात, और 
 जब गीरता है पानी 
 होती है रिमझिम बारीश,
 तब बन जाते हैं 
 वे इंद्रधनुष,
 
 फैल जाते है
 चमकीले रंगोंकी तरह,
 रखती हूँ मै
 धीरे से 
 हर रंग पर कदम,
 
 तैरती हूँ इस 
 रंगों भरे इंद्रधनुष के 
 हर रंग में,
 डूबती - उतरती,
 हंसती - खेलती 
 उडती हूँ बहूत
 गहरे और ऊंचे,
 
 रात मे बनाती हूँ 
 उन चाँद - तारों का 
 एक रथ ...
 दूर - दूर, और 
 बहूत दूर 
 आकाशगंगा के छोर 
 से भी आगे,
 
 जाती हूँ ढूंडने 
 कुछ और तारे,
 जो दे कुछ और 
 रोशनी 
 मेरे घर के आसमां को,
 
 फिर लौट आती हूँ,
 लिखती हूँ यादें
 उस दूर आसमां की,
 पर क्या कोई मानेगा 
 ये सच, कि
 सच में 
 परी हूँ मै !!
 
     18.3.2014 / 12:00 दोपहर 

Saturday, March 22, 2014

ये खुशी भीगी हुई


                                          पंछी जादूगर सा है 
 
 
  ये जमीं है, आसमां 
 इस जमीं पर ये कहां, 
                               बादलों के घर है देखो 
                               चाँद - तारों का ये जहाँ,
 
                               ऊंचे आसमां पर है, उड़ता
                               पंछी जादूगर सा है,
                               उसकी दुनियाँ कितनी ऊंची 
 और जमीं है बेपनाह,
 पंख खोले उड़ रहा है
                               भर ले उन में दो जहां,
 
   थाम लो दिल के हाथों, 
  ये खुशी भीगी हुई, 
 गिरते पानी की नमी सी, और 
  मरू सी गर्म आह,
  नींद की बाहें खुली है
 सपनों पर वो मेहरबां,
 
       ये जमीं है, आसमां 
 इस जमीं पर ये कहां,
                               बादलों के घर है देखो
                               चाँद - तारों का ये जहाँ....!!
 
                                     10.3.2014 / 11:40 सुबह

Wednesday, March 19, 2014

खामोशी की गुनगुनाहट



                                                         फिर एक बार 


 खामोशी की गुनगुनाहट -
                                          कितनी गहरी, और 
 कितनी साफ है,
 कैसी उडान है उसकी 
 पूरे घर में फैल गयी,

 अचानक लौट आयी 
 खिड़की पर,
 ठंड के अहसास में घुली,
 धूप का रंग देखने,

 साफ आसमान,
 धूप -
 चलती ठंडी हवा, और 
 ऊँचे बिजली के टावर से 
 झूलती एक कटी पतंग, और 
 क्या कुछ दिखेगा 
 हिलते पत्तों के आलावा,

 संगीत की आवाज 
 धीमी, पर साफ,
 उड़ान पंछीयों की,
                                      और जाने कितनी - कैसी 
                                      आवाजें,

 हर दिन की ही तरह 
 आज का दिन,
 ऊब गई ख़ामोशी,
 अपने पंखों को फैला 
 फिर उड़ान भरी 
उड़ते बगुलों के साथ,

 कितना कोलाहल है,
 कितनी ऊँचाई है,
 कितनी खुशी है 
 इस शोर में,

 धीमा संगीत ऊँचा
 बजने लगा, सुनो 
 लौट आना तुम -
 जब भी बगुले लौटे,
                                     तुम, प्रिय ख़ामोशी
फिर एक बार !!

3.3.2014 / 11:10 सुबह 
( अपनी खामोशी को सुनो ) 

Tuesday, March 18, 2014

रेत की है आशायें मुठ्ठी में न तू भर


 
 चाँद, तारों के घर 
   

 जन्मों की बातें है, या 

  सपनों के है शहर,
  रात भर ऊंघा किया 
  चाँद, तारों के घर,
 
  क्यों बेचैन है नजर-
   किस की है फिकर,
 जो तेरा है नही 
 क्यों चला उस डगर,
 
                                      कितना भी जकडो उसे -
 छूटेगा, तुझसे वो 
                                      ओ बेखबर,
 
  रेत की है आशायें
 मुठ्ठी में न तू भर,
 क्यों थामे तेरी नजर,
 
                                      जन्मों की बाते न कर,
                                      सपनों का है शहर,
                                      आज होगा, जो-
                                      वो कल नही,
 सपनों में जी 
 न इस कदर......
 
                                      जन्मों की बातें है, या 
                                      सपनों के है शहर,
 रात भर ऊंघा किया 
 चाँद, तारों के घर....!!
 
                                               18.3.2014 / 9:30 रात 

  

                                      
  

Monday, March 17, 2014

खामोश ख्यालों और बारीश का दिन


 
फिर वही खामोशी 


रात बारीश की 
सुबह तक होती रही,
ठंड और हवा 
रोक नही पायी 
गौरयों को,

बाजरे के खेत, और 
शहतूत की डालो पर 
झूलने लगी सारी,
वे खा ज्यादा रही थी
या बोल ज्यादा रही थी,
पर जाने किस की 
आहट पर 
उड़ गई सारी,

फिर वही खामोशी,
फिर पानी गिरने लगा,
हल्की - हल्की बारीश, और 
चलती हवा,
रोक न पायी 
ख्यालो को,

वो आते रहे,
फैलते रहे 
कमरा - कमरा,
झूलते रहे 
खिड़की - दरवाजों
के पल्लों पर,
हवा ने बिछा दिया 
उन्हें मेज और कुर्सीयों पर,

कितने ख़ामोश है वो, और 
हवा की साय - साय 
कितनी ठंडी,
अचानक बजी फोन की घंटी से 
वे भी उड़ गये,
घंटी बजती रही 
और कुछ देर बजती रही,

क्या कहना - क्या सुनना,
धूप निकलती तो 
शायद  
कुछ कहा जाता -
सुना जाता,
चिड़ियाँ भी लौट आती,
साथ ख्याल भी,

हाथों की गर्माहट 
हम सुन पाते -
देख पाते, और 
चलते एक दिन यूही
अगले दिन तक 
चाहे कितनी भी 
फिर बारीश होती !!

      
                                                    1.3.2014 / 2:30 दोपहर 

Wednesday, March 12, 2014

एक याद - 'जिप्सी लव सांग 1923'

                                                         
                                                   टुकड़ा - टुकड़ा आसमां 


कितनी तेज थी 
हवा चल रही,
आज बारीश का 
दिन था, या 
हवा का,
लगता था मानो 
लगी थी दोनों में शर्त,

मेरी बालकनी से 
दिखता है जो आसमां ..
वो भीगता रहा 
पूरी शाम 
फिर रात तक,

क्या यूही भीगा है 
तुम्हारा आसमां भी 
रात भर, 

हवा पर्दों को झूला बना 
झूलती रही, और 
उडती रही कमरा - कमरा,
हर झौका एक कहानी कहता था,

तुम यादों में हो मेरी, या 
तुम खुद एक याद हों,
हवा बेचैन है मानो,
टिकती ही नही,
लगता है जैसे कई रूहें है 
यादों की बेचैन,

सपने है ...
पानी के बुलबुलों की तरह,
फूट कर फिर 
अंकुरित होते है,

मेरे आसमां में बादल है,
तुम्हारे आसमां में क्या 
चाँद निकल आया है ?
टुकड़ा - टुकड़ा आसमां, और 
बांटे है हमने तारे,
चमकते है जो नींद की 
खामोश गहराईयों में,

आओ चलो 
तैरे हम - तुम 
  इन खामोश गहराईयों में, 
हवा की लहरों पर 
एक नयी याद लिये !!

                                              12.3.2014 / सुबह या रात 1:00

( दिल को समझाने तेरी याद चली आयी है)





Thursday, March 6, 2014

दरियागंज : एक विरासत का सफर


 
कोई झांकता भी नही 
 
रविवार के दिन 
निकल जाओ 
वहाँ की चौड़ी गलियों में,
 
पुराने घर 
काफी ऊँचे उठे हुए,
दुकाने खोल सभी लाला हो गये...
पेशावर तो बहुत पीछे छूट गया... 
आज सिर्फ धुंधली यादें, और 
कुछ कबूतरों के जोड़े है,
खिडकियों के पल्ले बंद है,
कोई झांकता भी नही,
 
'थी कभी...पुरानी हवेली.. 
 आज छापाखाना है,' 
बूढा तिरछी नजर डालकर बोला, 
क्या इमारते भी सोचती है !
जैसे - जैसे होती है वो बूढी,
देखती है समय को,
धूप..बारीश..ठंड..हवा..
                                जाने कितने कैसे दिन, और 
रात की परछाइयों का सफर,
 
 एक पुरानी विरासत है,
 जाने कब 
सब दुकानों में बदल जाये,
इसलिए घूम लो 
जहाँ तक चाहो,
रविवार का दिन है..
कोई झांकता भी नही !!
 
 
                                                23.10.1994 / दिन  
                                               6.3.2014 / 4:50 शाम