Wednesday, January 29, 2014

बिल्ली देवता उर्फ मिस्टर रावण



                                        मिस्टर रावण   

दशहरा शुरू होने मे अभी पन्द्रह दिन थे!  इस छोटे से गाँव मे हर             साल रामलीला तो होती थी पर रावण कभी नही बनाया गया! यहाँ की रामलीला देखने आसपास के और थोड़ा दूर-दूर के गाँवों से भी लोग देखने आते थे!मुश्किल से बच्चे-बूढ़े और जवान मिलाकर सौ लोगो का गाँव होगा! रावण बनाना खर्चे का भी तो काम है!
'तो क्या हुआ! हम सब मिलकर रावण बनाते है!' सब ने तैय किया!
पिछली दस दिवालियो के बचे पटाखे, साथ ही आने वाली इस दिवाली के भी पटाखे इक्कठे किये गए!
बच्चे लाये घास - फूस - पत्ते और फूल भी, रंग भरने के लिए!
गाँव की औरतों ने दिए कपड़े - जरी - गोटा, और...जी, दर्जी ने सिल दी-
वाह! क्या सुंदर पोशाक, यानी के ड्रेस!सुनार ने कुछ नकली जेवर बना दिए, पर चमक इतनी की सोना फीका लगे, मतलब के नकली लगे! गाँव की औरतें मिस्टर रावण के जेवर देख हैरान थी और अपने जेवरों को देख सोच रही थी कि ये असली है या फिर रावण के असली है!खैर, लकडहारे ने लकड़ीयाँ दी, और बढ़ई ने क्या कमाल कीया - ग्यारह फूऊऊ..ट ऊचां दस सर वाला रावण बना दिया!दर्जी और बच्चों ने मिलकर घास - पत्ते और पटाखे भर कर सील दिया रावण!
गाँव के सबसे होशियार बच्चे जिनकी चित्रकला यानी के ड्राइंग बहुत अच्छी थी उन्होंने मिलकर बनाए रावण के आँख, नाक, मुँह और साथ ही भर दिया रंग!वो बात और थी कि दस बच्चों ने दस कमाल कीये! जिसको जिसका चेहरा पसंद था उसने उसे याद कर वैसी ही शक्ल बना दी!

सबसे बडे सर का चेहरा किसने और क्या बनाया??? और ये क्या है?!?!?!!!!
'ये मेरी बिल्ली है आंटी, मुझे बहुत अच्छी लगती है!' वह बोली!
'आप कितने साल के हो और आपका नाम क्या है?' पूछा, जाने किसने!
'मेरा नाम संतरा देवी है और मै नौ साल की हूँ!' वह बोली!
'और आपकी बिल्ली का नाम?'
'जहांआरा!' संतरा देवी बोली!
'बिल्ली का नाम जहांआरा और आपका नाम संतरा देवी, हूँ..., बहुत बढियां..., यानी के वैरी गुड!'
...तो जी संतरा देवी को अपनी बिल्ली बहुत अच्छी लगती है,...शायद हद से ज्यादा! इसका पता इनके मिस्टर रावण की शक्ल से देख कर लगता है!
उन बच्चों की उम्र आठ - नौ साल से लेकर बारह - तेरह साल थी!तो जी, किसी को फिल्मे पसंद थी, तो किसी को इतिहास और किसी को अपनी भेड़ - बकरियाँ!
उन चेहरों मे सबसे अनोंखा एक चेहरा था-
हीई...टल-लर मेरा मतबल है हिटलर !!! अरे ये क्या है? 
बच्चे अपना कमाल कर चले गए! रावण सजा - धजा खड़ा था! गाँव के बड़े और बूढ़े रावण देख बहुत खुश थे!

Tuesday, January 21, 2014

एक अकेले टिड्डे का गीत


  
 
                                       हो गया मै कबीरा 
  
          डम - डम - डम - डम 
          डी - रा , डी - रा 
          डम - डम - डम - डम 
          डी - रा , डी - रा,
          डीरी - डीरी
          डी - रा, डी - रा,
          डम - डम - डम - डम 
          डी - रा , डी - रा.....
         खा रहा था टिड्डा खीरा,
         छैलछबीला प्यारा सा कीड़ा,
         झूम - झूम के नाचे है वो 
         गा - गा कर वो शोर मचाये,
         शाम को बोले -
         रात को गाये,
         तारों को देखे - गाये,
         गिन के उनको 
         फिर सो जाये -
         डम - डम , डीरा - डीरा .....
        सुबह - दोपहर 
        और फिर शाम,
        नदी किनारे 
       खेत - चौबारे 
       बीच मे आया 
       आम का बाग,
       डम - डम, डीरा - डीरा ......
       उछले वो गाये 
       झूमें वो जाये, 
       नाच - नाच कर 
      शोर मचाये,
      डम - डम - डम - डम 
      डीरा - डीरा ....डीरी..री..री..रा 
      मै हूँ अनोखा 
      प्यारा सा कीड़ा,
      न मै हूँ प्यारी सी तितली,
      न मै हूँ छोटी सी चिड़िया,
      मै तो हूँ एक 
      भूल भूलैया,
      जो बस 
      उछले और गाये,
      ढूंडो 
      छुप जाये, 
      बूझो तो, जानू 
      सूर पहचानू 
      डम - डम, डीरा - डीरा
     सुबह से हो गयी रात,
     बस मै करू 
     तारों से बात 
    और नही कोई..ई..ई..
    डीरी - डीरी - डीरा 
    डीरी - डीरी - डीरा 
    डम - डम - डम - डम - डीरा 
    हो गया - मै 
    कबीरा...आ 
    डम - डम, डीरा - डीरा .......!!

Thursday, January 16, 2014

एक अजीब सा ख्याल : क्या कहोगे इसे तुम



  
                                        जब हम तस्वीरें होंगे
  
                                       जब हम तस्वीरें होंगे 
                                       बस सिर्फ तस्वीरें,
                                       और देखेंगे लोग 
                                       पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें,
  
                                       क्या सोंचेगे वो -
                                       क्या कहेंगे-
                                       पर क्या कोई जानेगा 
                                       ये कि
                                       हम क्या सोचते थे,
                                       क्या कहा था हमने, 
                                       या फिर 
                                       खामोशी खामोश ही रही 
                                       हमारे बीच
                                       और एक जुग बीत गया,
  
                                       तस्वीरें धुंधली नही पड़ी 
                                       यादें धुंधला रही है,
                                       कोई याद 
                                       खिड़की के अंदर 
                                       आयी थी अभी,
  
                                       मुस्कराती तस्वीर 
                                       जगमगाते जुगनुओं की तरह 
                                       आसमां सी 
  लगती है,
                                      उसे देख सकते हो 
  मगर छू नही सकते,
                                      अहसास ही बचा है 
                                      धडकन में कही,
                                      पर आँख में कोई 
                                      हरकत नही,
                                      झाँक कर देखो 
   चाहे कितना 
                                      उन आँखों में 
                                      अब तुम !!
  
                 
                                                                          27.12.2013 / 12:50 सुबह

मेंढक और बादल का खेल


                                                            खेल तमाशा  
   
धाँय - धाँय - धाँय - धाँय... 
मेंढक करता 
धाँय - धाँय, 
झूठमूठ की लेके बंदूक 
दिनभर करता 
धाँय - धाँय,
बादल को डरता 
दिन भर वो 
करके झूठी 
धाँय - धाँय,
हंसता बादल बरस गया 
सुनकर उसकी 
धाँय - धाँय,
पर टपकी जो
मोटी सी बूँद
उछल गया मेंढक 
बिन देखे 
दांय - बांय,
फिर आगे - आगे 
भाग रहा वो 
पीछे बादल करता 
धम - धम 
सांय - सांय,
फिर धूम - धडाका
सुन कर रुक गये दोनों 
कोई खेल तमाशा होता था,
क्या वो तोता 
मोटा था 
या बंदर प्यारा 
छोटा था,
खेल मदारी का
था बड़ा अच्छा 
पर सिक्का मिलता 
खोटा था,
दिन भर दोनों 
खेल दिखाते 
फिर भी मिलता 
पैसा खोटा था,
तोते की मिर्ची 
दर्जीन ले गई
और खा गया केला
बच्चा मोटा सा,
जिसे देख कर 
बंदर रोता था,
कर न पाया 
कुछ वो देखो 
क्योकि 
वो छोटा था,
भाग गया फिर 
तोता देखो 
साथ मे बंदर 
छोटा था,
खेल तमाशा 
खत्म हो गया 
याद आ गई 
धाँय - धाँय,
आगे - पीछे
भाग रहे थे 
मेंढक  - बादल 
करते देखो
धाँय - धाँय
धम - धम 
सांय - सांय
धाँय - धाँय.....!!!
     

Monday, January 13, 2014

पीएच. डी. बंदर भाई : ??


क्यों फोटो  नही लगाई 
 
                                   मस्त कलंदर सारे बन्दर 
करते थे लड़ाई - के
अकबर का न बाबा था 
न थी उसकी माई - क्योकी 
घूम - घूम कर किला है देखा 
क्यों फोटो नही लगाई 
जिसमे उसका बाबा होता 
बैठी साथ में उसकी माई,
लाल किला बनवाया शाहजहाँ ने,
अकबर का पोता था वो भाई 
कैसे हम मान ले इसको 
क्यों फोटो नही लगाई,
जिसमे बैठा अकबर होता 
गोद में पोता, भाई,
अकबर के इस पोते ने 
ये कैसा ताजमहल बनवाया-
घूम - घूम  कर थक गये हम 
नही कुर्सी पड़ी दिखाई,
बाबर से अकबर तक 
अकबर से शाहजहाँ तक 
सब दादा - पोते 
ये कैसे मान ले भाई,
घूम - कूद कर सब 
किले है देखे 
क्यों फोटो नही लगाई,
सुनकर उनकी ये बाते - 
मास्टरजी ने, अरे 
अपनी छड़ी घुमायी,
डर कर पीछे कूदे - फिर 
जंगल में वो भागे सारे - ये 
कहते - नही करनी हमे पढाई !!
             
  

Friday, January 10, 2014

एक ख्यालू तोता



 मै पहलवान
 

 खेल रहा था 
 छोटा बन्दर
लेके हाथ में लोटा, 
देख रहा था उसको छुपकर 
था वो हाथी मोटा, 
मै भी उछलू बन्दर सा 
तो हो जाऊ छोटा, 
हू-हा....ही-हा ....हा 
करता रोज था भालू 
सुबह - शाम वो 
कूँगफू करता 
भूल गया था आलू, 
आलू थे सारे मोटे - ताजे 
खा गई उनको बकरी 
भीग रही थी बारीश में 
भूल गयी थी छतरी,
छतरी लेके जाता था जो 
वो था अपना गध्धू
डिस्को डांस वो करता था 
पहन बड़ा सा पज्जू, 
बैठा था जिस डाल पर हाथी 
पेड़ था वो जरा छोटा,
रहता था उस डाल पर अपना 
प्यारा मिस्टर खटपट तोता,
अजब गजब वो तोता था, 
खुली आँख वो सोता था, 
सपनों में बन पहलवान 
चलता था वो सीना तान, 
पटके उसने हाथी ढेरों
ऐसी थी कुछ उसकी शान, 
हाथी के वजन से देखो 
गीरा पेड़ वो ऐसे धड़ाम
हाथी नीचे तोता ऊपर
सच मे हो गई आनो - शान, 
उछल - उछल कर अब 
तोता बोले -
सच मे हो गया 
मै पहलवान !!!

शैतान बंदरो की मस्ती





                                                         हम हो जाये सिकंदर 

                                                  हांक रहे थे 
 सारे बंदर,
थे वो बड़े ख्यालू -
 गोभी में तूम आलू डालो 
तो बन जाये भालू -
 
भालू हो थोड़े 
मोटे - मोटे,
न हो सारे कालू,
                                     कुछ हो थोड़े नीले - पीले -
कुछ भूरे झबरालू,
 
 कुछ हो चिड़ियाँ
                                     जैसे उड़ते,
कुछ हाथी से झगड़ालू,
कुछ नीम से कडवे 
दातून हो,
कुछ रसगुल्ले से खालू -
 
मटक - मटक कर चलते हो वो-
 पटक - पटक कर पाँव,
                                    बादल को जब वो पटकी दे वो 
 तो हो जाये छाँव,
हाथी डर कर भागे उनसे,
गधे छोड़ कर गाँव,
मछली भागे नदिया से-
शेर बोले म्याऊँ,
 
हा - हा - हा, हो - हो - हो 
करने लगे फिर बंदर 
हम पर गर -
पंख लग जाये 
हम हो जाये सिकंदर !!!

Tuesday, January 7, 2014

एक लोरी - सपनों से भरी नींद की



                           पानी का रंग 


सपना मीठा सा  
       पानी का गहरा रंग,
       पंख लगा कर उड़ गये 
देखो सारे रंग,

आसमां, आसमां  
बन गया पतंग,
हो गये बेघर तारे 
बिखरे जमीं पर सारे,

टिमटिमाते वहाँ है -
पर जुगनू बने सारे 
देखे जमीं से 
आसमां को,
आँहे भरे मिलके सारे,

फिर परियों की रानी आयी
लौटाया उनका घर,
रंग...ऊहू 
बन गये पंछी 
गाने लगे फिर सारे,

हूँऊ....हूँऊ .....हूँ..हूँ  
सपना मिट्ठा सा 
और 
पानी का गहरा रंग......!!!

Monday, January 6, 2014

एक बिल्ली की उलझन





                                                                    मै कैसे चूहा खाऊँ


                                               माँऊ - माँऊ - माँऊ 
मै सारे चूहे खाऊं,
दो पैसे की चुहिया दे दो 
या पंजा दिखाऊँ,
पंजा देख के मुर्गी चौकी 
डरती - हंसती बोली - क्योकि 
सारी चुहियाँ बिक गई मेरी 
कहाँ से चुहियाँ लाऊँ...

इक मोटा सा चूहा बस है 
बोलो तो दिखलाऊ,
पर सोच समझ कर 
सौदा करना,
देख कर उसको 
तुम न डरना -
चूहा क्या है मोटा सा 
लगता सिक्का खोटा सा,
न डरता - न रोता सा,
सुबह ही पीटा
बिल्ला मोटा सा,

जब गुस्सा हो जाये
फिर सोच - समझ न पाये
जो सामने आ जाये 
फिर पिट कर ही घर जाये,
अब क्या बतलाऊँ मासी -
सुबह - शाम वो कसरत करता 
शेरों को वो छेडा करता 
जंगल सारा उससे डरता -
बोलो तो दिखलाऊ -

सुन कर मुर्गी की बाते 
बिल्ली थोड़ा घबराई,
फिर भी संभल कर 
वो बोली -
थोड़ा रुक जाओ मुर्गी रानी,
मै अभी लौट कर आती हूँ,
क्या बतलाऊ मै तुमको 
मै पर्स घर पर भूल आयी,
माँऊ - माँऊ - माँऊ 
मै अभी लौट कर आऊ,
छोटा सा तो मुँह है मेरा 
मै कैसे चूहा खाऊं !!

Sunday, January 5, 2014

ठंडी हवाओं और एक यादों भरी दोपहर






                                                                झाँकती है दुनियाँ आईने से  


                              छन कर आयी है 
                रोशनी के साथ 
                                                        धूप खिडकियों से 
                अंधेरे कमरे में -
                आईने की आँखे  
                खुल गयी,
                                                        झाँकती है दुनियाँ 
                                                        आईने से,

                                  
                                                       झानझरोखा है सबकुछ, 
                                                       शून्य मे देखता कौवा 
                                                       अजब तरह से सर 
                                                       हिलाता है, फिर 
                                                       सोचता है क्या- 
                                                       क्या सचमुच दुनियाँ 
                                                       झानझरोखा है,

               हवा लिपटती है 
                अपने ही आगोश में,
              कमरा - कमरा फैलती है 
              फिर ठहरती है 
              आईने के सामने-
              पत्ते हिलते हुए 
              चिड़ियाँ उडती हुई देखती है,
              सोचती है शायद वह भी 
              उहाँसे भरती हुई 
              झाँकती है दुनियाँ आईने से 
              दुनियाँ झानझरोखा है !!
       
                                 8.3.2013 / 3:40 दोपहर 
 
  

पतझड़ भरा शहर - चेरनोबेल- एक याद


                                                             पतझड़ भरा शहर


        बस गई सर्दियाँ
          वहाँ,
  हमेशा के लिए 
  पतझड़ रह गया बस 
  शहर उजड गया,

  बसंत का एक लम्बा 
  इंतजार 
  और एक
  पतझड़ भरा शहर !!!

      ( चेरनोबेल- एक याद ) 
  उजड़े झूलों
                                          वीरान इमारतों 
                                          बेजान
                                          हवा से भरा.....

                                                                                                                       
                                                                26.4.2013 /  रात 9 बजे       

नींद: एक ख्याल - एक सपना

                                  
                                           नींद


                                रात भर जागी है नींद...
                                चीड़ के दरख्तों पर 
                                रोशनी की छत है बनी, 
                                उबासीयों की आहट  
                                सुनायी दी है अभी,  
                                चलो सो जायें
                                दरख्तों की शाखाओं पर,
                                इक गिलहरी कूदी है 
                                सपनों में कही!   

                           27.11 .2013/ 11:15 सुबह,                                         
                           कौन है जो देखता है
                           छुपके कहीं से, चुप रह कर
                          भी बताता है कहाँ हूँ मै....