Wednesday, December 31, 2014

कहानियाँ बनती हैं....


स्पिंस्टर हाउस 

अंधेरा फैल चुका था, मगर आसमान में एक भी तारा नजर नही आ रहा था! हवा से हिलते पत्तों की सरसराहट साफ-साफ सुनायी दे रही थी! कुछ घरों में अभी भी रोशनी थी! दूर एक घर में रोशनी है! देर रात गये कई घर जागते रहते है! उनके दरों दीवारों को भी जल्दि नींद नही आती!

धम्म-धम्म और बीच-बीच में टन-टन की आवाज़ आ रही है, लगता है कोई हमाम दस्ते में कुछ कूट रहा है! अंधेरे को चीरती हुई, हवा के साथ बहती हुई यह धम्म-धम्म की आवाज़ इसी घर से आ रही है! घर के अंदर कही कम कही ज्यादा रोशनी है! संगीत की धीमी आवाज़ भी आ रही है!


'बूआजी, दूध!' संध्या दूध का गिलास रखते हुए बोली!

एक बूढी औरत चौकी पर किताब रख पढ़ रही थी या न मालुम देख रही थी! संध्या की नजर बूआजी की किताब पर पड़ी जिसे की वे बड़े गौर से पढ़ रही थी या फिर देख रही थी और साथ ही अपनी माला भी जप रही थी! बूआजी ने पल्लू से अपना सर भी ढका हुआ था! माला जपते हुए वे बीच-बीच में गहरी सांस भी ले रही थी! संध्या के आने पर वे उस पर ध्यान नही देती है बस एकटक किताब देख पढ़ रही है!

पर किताब पर नजर पड़ते ही संध्या के होटों पर मुस्कराहट आ गयी और वह मुस्कराती हुई कमरे से बाहर चली गयी! बूआजी बड़े गौर से के. एल. सहगल की जीवनी पर लिखी किताब पढ़ रही थी! वह किताब बूआजी यानी पदमा देवी को किसी रामायण या गीता से कही ज्यादा प्यारी थी! कमरे में लगी बड़ी सी के. एल. सहगल की तस्वीर उनके इस अथाह प्रेम को दर्शाती है, और अक्सर ऐसा ही होता था कि पदमा देवी उठते-बैठते, चलते-फिरते उस तस्वीर को बड़े गौर से देखती और लम्बी गहरी साँस छोड़ कर आँखे बंद कर लेती!


संध्या के कमरे से बाहर जाते ही पदमा देवी ने सर पर से पल्ला हटाया और रिकार्ड की आवाज थोड़ी ऊँची कर दी, जिससे अब उसमे से आ रहे गाने के बोल साफ-साफ सुनायी देने लगे थे, '....रूही-रूही, रूही.....मेरे सपनों की रानी, रूही.......!' पदमा देवी ने पीछे सहारा ले आँखे बंद कर ली!


अरे भई, वो सोई नही थी, वो बस कुछ सोच रही थी! वो बस कभी-कभी बस ऐसे ही सोचती थी, शायद पीछे छूट गयी किसी बस के बारे में, मुझे लगता है उन्हें वो बस पकड़ लेनी चाहिए थी, पर उन्होंने पकड़ी नही!!!! शायद इस्सी लिए, मेरा मतबल है इसी लिए वो अक्सर ऐसे ही बस सोचती रहती थी!


जवानी के दिनों में खासी (ध्यान दे यहाँ खासी और गोरा जनजाती की बात नही हो रही) सुंदर महिला रही हैं! काफी और एक कप चाय, हाँ तो काफी पढ़ी लिखी हैं और पढाती भी थी, औरर जब तक आँखों में चमक, चाल में दमक औरर बालों का रंग जेट ब्लेक यानी काढ़े जैसा काला था तब तलक(महमूद) के.(डॉट) एल.(डॉट) सहगल के अलावा किसी का ख्याल नही आया और समय बीत जाने पर छैल-छबीले मर्दों को उनका ख्याल नही रहा और वे बूढी हो गई! पीराब्लेम यह हुई के बालों को रंग कर भी कुछ न हुआ!!! सहगल साहिब की फिल्मों की तरह पदमा देवी की लाइफ भी बलेक एंड बाईट हो कर रह गई! आफ-सोंस क्या करना उन्होंने अपनी लाइफ की चटनी नही बनाई यही शुक्र (शनी सारे ग्रह और उप-गृह बच गये) है!



Friday, December 26, 2014

गाछेर बाड़ी - एक बैरागी का गीत



                                                     बैरागी 

                                         इक बैरागी 
                                    रोज़ था जाता -
                                    इक गीत वो 
                                    हर पल गाता,
                                    हर पंक्ति में यह 
                                    गाता - जाता ......
                                    'ओ निर्दयी, तू कैसा विधाता....
                                    मै माटी, मै माटी 
                                    तू अंबर दाता - 
                                    मै बैरागी गाता जाता.....
                                    न मै समझू..... रात - अँधेरा 
                                    दिन का उजारा 
                                    कब है छाता....
                                    हाथ फैलाये मै हूँ गाता,
                                    मै मांगू - तू है दाता..
                                    समय का खेल 
                                    ये कैसा जाता...
                                    ओ निर्दयी, तू कैसा विधाता.....
                                    मै बैरागी गाता जाता......'
                                    इक बैरागी रोज़ था जाता......!! 
  
  
यह गीत 'गाछेर बाड़ी' उपन्यास में से लिया गया है! इस गीत में उस बैरागी की भक्ती है प्रभु के प्रति, पर उपन्यास की नायिका मणिमाला बैरागी के गीत में अपने दर्द की छाया देखती है....

परी-लोक : राजाओं की घाटी की रहस्यमयी दुनियाँ, तूतनखामन


परी-लोक 2 
 
रेत के वीरानों  में 
 रात-दिन उडती-घूमती 
हवा क्या ढूँढती थी भला,
क्या खोजती थी.....
                              किसे थी ढूँढती भला!!!
 
गुजरते काफिलों को 
                              देखती हसरत भरी 
नज़रों से थी पूछती,
                              कोई सुन पाता उसे....
 
                             पुरातत्ववेत्ताओं को सुनती 
उनके औजारों को टटोलती...
उनकी खोजों में खोजती 
                             किसे थी खोजती!!!
                             कौन था जिसके लिए 
                             यूँ थी भटकती,
 
रेगीस्तान में बसंत कहाँ
पर एक बसंती हवा 
     थम गयी, बस एकटक 
                             देखती नज़रें खुलते 
उस दरवाज़े को,
 
                            खोल रहे थे जिसे 
  पुरातत्ववेत्ता अपनी बरसों की 
                            अथक मेहनत के बाद,
राजाओं की उस घाटी में 
                                 ढूँढ़ते एक राजा को,
 
खुला वो दरवाज़ा 
धक से लौटी धडकन 
हवा के सीने में, और 
वह तेजी से बढ़ी
सबसे पहले उस मकबरे में,
 
 हैरान नज़रों से थी देखती 
                            उस रहस्यमयी दुनियाँ को, 
 टटोलती किसी पुरानी 
सदियों पुरानी याद को,
 
  हाँ, शायद यही तो थी 
 वह पुरानी याद जिसे थी 
                            वो खोजती इस वीराने में
राजाओं की इस घाटी में,
रहस्यमयी दुनियाँ में 
                            दबे रहस्यों को सुनती 
देखती उस परी-लोक को,
 
 लम्बी सांस भर 
लौट आयी बाहर... 
उड़ चली फिर कही ओर
                           इन वीरानों से दूर 
                           किसी और परी-लोक की 
 भूली हुई खोज में!!!
 
                                  18.12.2014 / 5:44 सुबह 

Friday, December 19, 2014

खिलते चैरी के फूल कहते है हमसे जीवन क्षणभंगुर है पर सुंदर है


                                 परी लोक - I 

हवा थम गयी -
सब रूक सा गया,
सांस रोके एकटक
देखती हवा....
बस एकटक....
अपनी धडकन सम्भाले 
बस देखती रही
अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से,
फूलों से पटे हुए शहर को,
चैरी के फूल थे, फिर 
ली एक लम्बी सांस 
धक से धड़का उसका दिल, 
फिर अपनी बाहों को 
फैलाये घूमी हवा,
घूमती रही, बस घूमती रही,
फूल हवा के साथ बिखरते रहे-
बस बिखरते रहे.....
ढक गयी ज़मीन
फूलों से, और 
वह चहलकदमी करती
और उडती-घूमती रही दिनभर, 
सब कुछ सपना सा था,
ऐसा कुछ पहले 
न देखा था कभी,
मानो हो कोई जैसे 
.......... परी-लोक!!

                                  18.12.2014 / 5:36 सुबह 

Sunday, November 30, 2014

एक अधूरी याद : मानो पिछले जन्म की बात हो

                                                 

 

                                  मै कहाँ हूँ 
 
 क्या आज भी 
  करते हो तुम वैसे ही 
                                बहकी - बहकी बाते,
  चलते - चलते 
                               लड़खड़ाते है कदम तुम्हारे,
 
देखते हो पलट कर...
   हंसते हो आँखे मीचकर, फिर 
                               मेरा देखना कही ओर 
                               करना अनदेखा तुम्हे...
  और तुम्हारा खिलखिलाकर 
हंसना..फिर चलना 
वैसे ही अपने ही कदम
                               गिनते हुए और बोलना 
बीच - बीच में कुछ और,
 तुम्हारी वो बातें...
कुछ उटपटांग 
   कुछ फूलों की, तितलियों की,
ट्रैफिक की, आसमान की और 
                               न जाने क्या - क्या,
 
       फिर अचानक कहना 
 होगा कोई पागल 
जो करेगा तुमसे प्यार,
 देखना एकटक...
 फिर मीचना वैसे ही 
अपनी आँखों को और 
हंसना खिलखिलाकर और कहना 
    मेरा भी दिमाग 
है खराब... पिछले जन्म से,
पलट - पलट कर देखना 
    मै कहाँ हूँ,
 
बरसों बाद कही 
      कुछ नही बदला और 
    कही अंदर सब कुछ 
                            गया बदल....कुछ न बचा,
                            यादें ढक गयी 
     नयी यादों से,
     प्यार ढक गया 
                            नये प्यार से, पर 
    आँखे मीच कर वैसे ही हंसते हुए 
  क्या तुमने पलट कर 
     फिर देखा कभी
 मै कहाँ हूँ......!!!
 
                              29.11.2014 / 5:26 सुबह

Thursday, November 20, 2014

रोशनी ही बस सुनायी पडती है

 
उन खिडकियों के पीछे 
 
जाने कब से 
एक अजीब सा हाल 
रहा है मन का....
गुजरते हुए किसी राह से,
  अजनबी घरों को देख 
 अजब सा ख्याल रहा मन में,
कौन रहता होगा इनमे?
 
                             बंद खिडकियों के पीछे 
कौन जागता - सोता होगा,
 पलटता होगा या होगी पन्ने 
किसी किताब के,
महक आयी वही पुरानी 
किसी ने बघार दी दाल में,
 
कौन सुन रहा है 
                             यह पुराना रिकार्ड,
बच्चा भूख से रोता है या 
 आ रही है उसे नींद,
फोन पर कर रही है बातें या 
अपने आप से करती है बातें, पर 
हंसी बहुत प्यारी है,
और न जाने, जाने 
क्या - क्या और 
कैसी - कैसी आवाज़े
और ख्याल बेशुमार,
 
शहर अपना हो या 
अजनबी, पर 
शहर - शहर है, पर 
अब सुनायी कुछ 
 देता नही तो ख्याल 
 भी नही आते, पर 
 ख्याल बहुत ख्याली होते है, 
 
                             अब शहर ऊँची उठती 
दीवारों में बसने लगा है,
रात में खिडकियों से झिलमिलाती 
 रोशनी ही बस सुनायी पडती है,
कागज का बनाऊ मै एक हवाईजहाज और 
 उड़ जाऊ हवाओं की लहरों पर 
 हिचकोले खाता उड़ता रहे ये जहाज,
 
भेजूं रेडियो की तरंगो पर या 
एक टेलीग्राफ संदेश -
टीक ...टीक ... टीक.. टीक...
 जवाब आये तो सही,
बताये कोई चाहे कैसे भी,
 चाहे तो भेज दे जवाब 
 मोस कोड में,
 
                             कौन रहता है -
शहर - शहर में 
घर - घर में ....
 झांकता है बंद खिडकियों से!!
 
26.8.2014 / 2:40 सुबह 

Sunday, November 16, 2014

जो रही जान ही न सीने में तो क्या लेगा



ज़िक्र - ए - नागवार 

रहा न खौफ़ का 
कोई खौफ़ अब, और 
न क़ातिल का कोई एतबार रहा!

जो रही जान ही न सीने में 
तो क्या लेगा,
काँपते हाथों का खंज़र
सीने के कब पार रहा!

छुपा के दिल में किसी बुत को 
इबादत का कारोबार रहा,
जो रहा सज़दे में तेरा दिल 
और खुदा तेरा राज़दार रहा!

कितनी शिद्दत सी है तूझे 
काँधे पर मेरी मय्यद की -
तो ला दे खंजर मै खुद ही 
सीना चाक कर दूं,
मगर उफ़! नामुराद खंजर भी 
ग़म - ख्ह्वार निकला,
तेरे पहलू से जो निकला 
वो बेज़ार निकला!

जो रहता दामन पर तो 
सकूं ज़माने भर को रहता,
मगर ये दाग सीने पर लिया हमने तो 
सबको नागवार गुजरा,
जो गुजरता है दर्द मेरी रगो में 
वो दिल से इस जहाँ से उस पार गुजरा!!

27.10.2014 / 10:40 सुबह 

कोई दस्तक है, हुई है,ये कहाँ देखो-




                      
                                     दो-जहाँ

                         कैसा लगता है जमीं पर 
आसमां  देखो -
ये जमीं, आसमां पर-
आसमां जमीं पर देखो,
हम से यूँ रूठने वाले -
कैसा उल्टा है - पलटा है 
                        मेरा जहां देखो,

                        उम्र की दहलीज पर  
खड़े इंतज़ार करते है, 
रात को दिन और 
दिन को रात करते है-
कोई दस्तक है, हुई है,
ये कहाँ देखो-
कैसा लगता है जमीं पर 
आसमां देखो-

मौजें टकराती है साहिल से 
मौजों का कारवां देखो,
इक शहर है, उस शहर में 
                     दूरियाँ है, हमारे दरम्या देखो,
न हो ख़फ़ा, जाते है हम अब-
कब और कहाँ देखो,
कैसा लगता है जमीं पर 
आसमां देखो .......!!


                                16.11.2014 / 5:45 शाम 

Tuesday, November 11, 2014

The Darkness Behind the Mirror

       
                                   A Thief


                       
Maybe or should I say Perhaps -                   
Imitation is the sincerest form of flattery.  But,I don't agree with it.

You can try steal my words but you never steal my language. 
You know why, you lack my whole personality.  
More you copy me more you hurt yourself because you can't be me. 
So,just stop it. 
Always remember - The darkness behind the 
mirror.  
    
                              11.11.2014 / 8:50 P.M

Monday, November 3, 2014

अच्छो को बुरा साबित करना दुनियां की पुरानी आदत है


                                     रूट न. 56


सफदरजंग पर बस रूकी, बस स्टैंड से सवारियां बस पर चढने लगी! तभी एक लडकी ने ऊची आवाज मे कंडक्टर से पूछा-
'ए कंडकटर बस केनाट पलेस जायेगी क्या?'
कंडक्टर जोकि रस्सी खींच कर बस चलवाने वाला ही था कि उसने लडकी को बस में चढने का ईशारा किया! उस पूछने वाली पहली लडकी ने दूसरी लडकी से कहा-
'ए रूपा चल बस जायेगी!'
दोनो बस पर चढ गई!
'दो टिकट दे दो केनाट पलेस के!' वही लडकी फिर बोली!
पचास का नोट देखकर कंडक्टर ने पूछा-
'क्या खूल्ले पैसे नही है?'
'नही, तू ही दे दे!' वह लडकी फिर बोली!
'अच्छा लाओ!' कंडक्टर ने नोट लेकर टिकट दे दिये!
बस में कोई सीट खाली नही थी! दोनो लडकियाँ खडी हुई आपस मे बात करने लगी! कंडक्टर उन दोनो की बाते सुन रहा था! उनकी बातो से लगा कि वे दोनो मेह्न्दीवालियाँ है और एक का नाम कंचन है और दूसरी का नाम रूपा! रूपा सुंदर थी और उससे ज्यादा सुंदर उसकी हॅसी थी! कंडक्टर  एकटक रूपा को देख रहा था! फिर एक ओर स्टैड आया बस रूकी एक सवारी उतरी कंचन बैठ गई! थोडी देर बाद कंडक्टर की बगल मे बैठा आदमी भी उतर गया! रूपा वहाँ आ कर बैठ गई! कंडक्टर ने उसके बैठते ही एक गहरी सांस ली!

जाने कौन सा तेल है........शायद चमेली का ही तेल है, पर नाम तो इसका रूपा है.....सावली है, पर प्यारी है! कंडक्टर सोचे जा रहा था! फिर वह खिडकी के बाहर देखने लगा, पर अब रूपा उसकी तरफ देख रही थी! अचानक कंडक्टर ने पलट कर रूपा की तरफ देखा, रूपा चौक गई पर कंडक्टर मुस्करा दिया! रूपा झेप गई! बस चलती, स्टैड आते बस रूकती, लोग चढते और उतरते रहे! वो दोनो ही आँखो के किनारों से एक दूसरे की तरफ देखते ! 

'ये रूट बडा ही लम्बा है, बस चलती ही जा रही है रास्ता खत्म ही नही होता! लगता है जैसे मानो कई घंटो से इसमे बैठे हों!' आगे की सीट पर बैठा एक आदमी दूसरे से बोला!

बस रीगल की लाल बत्ती पर रूकी! कंचन ने चिल्ला कर कहा-
'रूपा रे... चल उतर जल्दि!'
रूपा जल्दि से उठी और तेजी से उतर गई! उतरते हुए उसने कंडक्टर की तरफ देखा! कंडक्टर धीरे से मुस्कराया! रूपा के चहरे पर भी मुस्कराहट आयी! कंडक्टर ने खिडकी से बाहर झांक कर देखा! दौड कर दोनों लडकियाँ पटरी पर चढ गई! रूपा ने पलट कर बस की तरफ देखा! वह धीमे से फिर मुस्करायी कंडक्टर भी मुस्कराया! बस आगे बढ गई!

Friday, October 31, 2014

यादें गुम हो जाती हैं और समय बीत जाता है, किसी को कुछ फर्क नही पड़ता...


                                    सलीम                  



आसमान में बादलों का कोई नामोनिशान नही था! सर्दियाँ जा रही थी! दोपहर में गली में कोई नजर नही आ रहा था! सलीम धीरे धीरे गली में  आगे बढा जा रहा था! रिक्शेवाला घंटी टनटनाता हुआ आगे बढ गया! इतने बरसो में काफी कुछ बदल गया था!

'बदलेगा ही बीस बरस काफी है कही भी कुछ भी बदल जाने के लिए!' सलीम को ख्याल आया और फिर उसके ख्याल रुके नही!
'सुजाता क्या आज भी वहाँ रहती होगी......कहाँ, अब तक तो उसकी शादी हो गई होगी!' जाने क्या सोच सलीम सुजाता के घर की ओर चल पडा!
सुजाता का घर एक गली छोड कर था, बल्कि कहा जाये तो सलीम के पुराने घर से बिलकुल उल्टि दिशा मे था! पर सलीम बस्ता लिये उसी गली से घर की ओर लौटता था! रोज सुजाता खिडकी से बाहर झाँक रही होती थी! शायद सलीम को ही देखती थी! ये दोस्ती थोडी अलग सी थी! ये दोस्ती थी बेर, अमबरक और ईमली के कच्चे कटारो की! जो सुजाता को थमा सलीम आगे निकल जाता था! दोस्ती भी शायद ऐसे ही हुई थी उन दोनो की! स्कूल छूटा था! बच्चो की भीड दौडती, धकयाती चल रही थी!
एक धक्का आया और सुजाता नीचे गीर गयी! दौड कर सलीम ने उसे उठा दिया! वो रोने लगी! उसके हाथ का दोना नीचे मिट्टी में गीर गया!
'अरे उसे मत उठाओ गंदा हो गया है, लो ये मेरा ले लो!' सलीम बोला!
सुजाता ने सलीम की तरफ देखा और दोना ले लिया! उसके शायद घुटने में चोट लगी थी! ठीक तरह से नही चल पा रही थी! सलीम ने आगे बढ उसका बस्ता ले लिया और उसका एक हाथ थाम उसके साथ चलने लगा!
'कहाँ है तुम्हारा घर?' सलीम ने पूछा!
सुजाता ने हाथ से गली की ओर ईशारा किया! सलीम ने सुजाता को उसके घर तक पहुचा दिया!
दरवाजे पर पहुच सुजाता ने पलट कर सलीम से पूछा- 'तुम्हारा नाम क्या है?'
'सलीम!' सलीम थोडा अकड कर बोला!
'सुजाता...मेरा नाम है!' सुजाता खुद ही बोल पडी!
'अच्छा नाम है, पर इसका मतलब क्या होता है बताओ तो!' सलीम ने पूछा!
'मालुम नही!' सुजाता ने भोलेपन से कहा!
'अच्छा तू जा, दूध में हल्दि डाल कर पी लेना, चोट ठीक हो जायेगी!' इतना कह सलीम हाथ हिला कर आगे बढ गया!
ये थी उनकी दोस्ती की शुरुवात!

एक पुरानी कहानी... एक याद चीड़ के पेड़ों सी


                                           गंदा भेड का बच्चा
  
सुबह सुबह नानी ने मुझे जगाते ही बताया कि नाना मेरे लिए कुछ लाये है!
'पहले बताओ क्या लाये है,.......बताओ न......नानी!' मैने कम्बल मुँह के ऊपर से हटाकर कहा!
'नही-नही, पहले उठो, नाना बाहर बुला रहे है!' नानी कंधा थपथपा कर बाहर चली गयी!
'तुम क्यो हर बार इतना कंधे पर मारती हो, चपटा कर दोगी!' मै कम्बल फैक पलंग से कूदता हुआ बोला!

'माँ...ये क्या है.....बकरी का बच्चा है?'
मै एक छोटे से भेड के बच्चे को देख बोला! पर माँ के बोलने से पहले नाना अपनी टोपी ठीक करते हुए बोले-
'नही, ये भेड का बच्चा है........तुम्हारे लिए लाये है!'
यह सुन मै बहुत खुश हुआ! मै उस बच्चे को प्यार करने के लिए जैसे ही उसे गोद मे उठाने लगा तो वो भेड का बच्चा उछल पडा और मै पीछे गिर गया! वो भेड का बच्चा उछल कर भागा और मै अपने कपडे झाड उठ खडा हो सबका चेहरा देखने लगा! सभी हँस रहे थे—माँ, नाना, नानी, खेत मे काम करने वाले सभी! सबको हँसता देख मै भेड के बच्चे के पीछे भागा! वो आगे-आगे और मै पीछे-पीछे! पर वो हाथ कहा आने वाला था! पर अचानक वो भेड का बच्चा रुका और मेरी तरफ पलट कर दौडा! उसे अचानक अपनी ओर आता देख मै डर गया! वो अपना सर आगे की ओर झुका कर आ रहा था! फिर क्या था, डर कर मै आगे-आगे और वो पीछे-पीछे!

'माँ ..माँ.. बचाओ-बचाओ, इस गंदे भेड के बच्चे से!' मै माँ की गोद मे चढ कर बोला!
 'हा..हा.. (नाना ने हॅसते हुए मुझे माँ की गोद से उठा अपनी गोद मे ले लिया और बोले)...ऐसे डरते नही है, देखो खाडू के बच्चे को ऐसे कानो से पकडते है! ( नाना ने मुझे गोद से उतारा और उस गन्दे भेड के बच्चे को उसके कानो से पकड उसका सर नीचे कर दिया ) देखो कितना आसान है, आओ पकडो!' 
मैने आगे बढ उसके कान पकडे और उसका सर जैसे ही झुकाया उसने अपने को झटका दे अपना सर मेरे पेट पर मारा और भाग गया और मै जोर जोर से रोने लगा! यह थी हमारी पहली मुलाकात! मै उस समय चार साल का था और वह दो - ढाई महिने का!
  

Tuesday, October 14, 2014

एक प्यारे बन्दर के लिए



                                     एक शैतान बन्दर का गीत
 

भारी भरकम, थे सब हाथी ..... 
रोज ही पढ़ते .... एक ही पाती ....ओहो ..
चिड़ियाँ खाना रोज है ....खाती,
न वो पढती - न वो गाती,
छुट्टी से पहले उड़ जाती .....
मास्टरजी को गुस्सा आती ....
बन्दर सारा शोर मचाती .....
कैसा गाना हम सब गाती ....
नौ का पहाड़ा भूल गये हम ....
दो का पहाड़ा नही है आती ....
मास्टरजी को गुस्सा आती ...
बन्दर सारा शोर मचाती .....

डोसा बन्दर का ये गाना 
सुन कर हो गया ... हाथी दीवाना ...
बोला हँस कर ..... फिर से सुनना 
मिलकर गाये फिर ये गाना ........

'जिसमे हाथी सारे खाती ...
कभी वो आती - कभी वो जाती ....
मिलकर सारे रेस लगाती,
बन्दर जिसमे शोर मचाती ...
मास्टरजी को गुस्सा आती ....'
हँस कर फिर उछला हाथी,
बड़े मजे से था वो - गाती,
इससे पहले पीटे मुझको 
हम तो बाबा यहाँ से जाती .....
मै हूँ बन्दर - वो है हाथी,

डोसा को जाते फिर देख 
गाने पर लग गया ब्रेक,
रोक कर रस्ता हाथी बोला .....
..वेट...वेट..वेट..वेट...वेट......
'प्यारे बन्दर किधर को जाती ...
हम भी पीछे - पीछे आती .....'
आगे बन्दर - पीछे हाथी -
इधर को जाती - उधर को जाती .....

सारी चिड़ियाँ शोर मचाती -
सारा जंगल ये गाना गाती ...
प्यारे डोसा ये क्या गाती ...
हम सब जंगल के साथी ...
आओ हम सब मिलकर गाती ....
'काला बादल - नीला हाथी 
अरे, पीली चिड़िया उडती जाती ...
मोटी - मोटी बूंदे जब गिरती ...
छम - छम - छम देखो बारीश आती ...'

पर बिन छतरी के सारा जंगल ...ओहो ..
भाग कर देखो सब छुप जाती ...!!! 


                                        25.7.2014 / 2:20 दोपहर

Friday, October 10, 2014

भरी बज्म में राज़ की बात कह दी..बड़ा बे-अदब हूँ सजा चाहता हूँ


    बहरूपिया
  
       खेल खत्म होने पर 
गिरेगा पर्दा.....
नाटक दिखा बहरूपिया 
आयेगा फिर एक बार 
मंच पर.........
झुकायेगा सर......
बजेंगी तालियाँ.....,

मुखौटा पहने 
दिखाता खेल,
रोता मुखौटा......
हसंता  चेहरा अंदर,

बजती रही तालियाँ......
रोते मुखौटे पर 
एक भी मुस्कराहट नही,
पर अंदर  चेहरा खुश है.....
वाह! कितना रुलाया उसने,

पर खेल खत्म हो गया....
                                 दर्पण के सामने 
उतरता मुखौटा....
चेहरा निकल आया...
खेल खत्म होने पर 
हर मुखौटा उतर जाता है,

पर आज वह हैरान है -
हैरान है दर्पण में देख, 
लगातार खेलते रोने का खेल 
उसका चेहरा भी 
मुखौटे जैसा हो गया,

उसकी आत्मा उतर आयी 
मुखौटे पर..... और 
मुखौटे ने अपना रूप लिया
उसके चेहरे  पर,
बहरूपिया रूप बदलेगा क्या?

उसकी हंसी - उसका अहम् 
गुस्से में बदल गया,
नफरत से भर 
मुखौटा दर्पण पर पटक 
वह चिल्लाया ....
झूठ है - झूठ है सब ....
बिखर गये टुकड़े 
बहरूपिया हैरान 
देखता रह गया,

हर टुकड़े में वही चेहरा....
सिर्फ चेहरे ही  चेहरे ...
रोता चेहरा बहरूपिये का,
क्रोध से और चिल्लाता बहरूपिया
झूठ है - झूठ है सब....
हर टुकड़े से आती दिखती 
एक ही आवाज -
झूठ है - झूठ है सब!!!

                                              24.9.2014 / 3:40 ढलती दोपहर 

कितना बड़ा है दुनीयाँ का घेरा, लोग दिलों से मिलते नही हैं


                                                 वेटिंग रूम


लगता है ये पूरी दुनियाँ ही वेटिंग रूम है...... आप इंतजार करते है ...... इंतजार???.. हाँ इंतजार ही तो करते है ..... कभी इंतजार पूरा होता है और कभी यूं ही छोड़ कर जाना पड़ता है.........

उसने अपने मन मे आते - जाते इन ख्यालों को बीच में छोड़ा और दिवार पर लगी घड़ी पर निगाह डाली! अभी भी तीन घंटे बाकी थे छ: बजने मे! स्टेशन पर गाडीयां आ जा रही थी मगर शायद यहाँ रूकती नही थी, पर उनका छोड़ा हुआ धुँआ वहाँ रुकता था ......... और वह वो धुँआ महसूस कर रही थी! स्टेशन की अपनी लाईट थी वरना रेल की पटरियों के उस पार काफी अंधेरा था! दरवाजे पर खडी वह उस अंधरे मे जाने क्या देख रही थी! प्लेटफार्म पर दूर - दूर तक कोई नजर नही आ रहा था!

हल्की - हल्की हवा चल रही थी! उसके बाल हवा से उड़ते और फिर उसके चहरे से चिपक जाते! वह उन्हें हटाती, फिर हवा से उड़ते फिर वह उन्हें हटाती! हवा का चलना और बालो का उड़ना और उसका उन्हें हटाने का सिलसिला चलता रहा!

वह धीरे - धीरे प्लेटफार्म पर चहलकदमी करने लगी! तभी किसी की आहट पर उसने मुड़ कर देखा! स्टेशन मास्टर थे! उम्र यही कोई पचास - एक होगी!

समय : ये न होता तो क्या होता

                                    दो प्यारे अजनबी  

                                 अगर  मै रोक लेती 
                                 समय को, उस 
                                 चाय के प्याले में.... जो 
                                 बढ़ाया था तुमने 
                                 मेरी ओर, अगर 
                                 मै समेट लेती 
                                 समय को, उस 
                                 छोटी सी बात में..... जो 
                                 लम्बी होते - होते 
                                 रह गयी कही, अगर 
                                 मै थाम लेती 
                                 समय को, उस 
                                 पल में जहाँ 
                                 शरारत थी तुम्हारे
                                 चहरे में, अगर 
                                 मै बढ़ कर छुपा लेती 
                                 समय को, उस 
                                 दिन जहाँ बिना बोले 
                                 लड़े थे हम 
                                 खामोशी से, तो हम 
                                 आज इतने अजीब से न होते.....

                                  पर अगर कुछ 
                                  और होता, कुछ 
                                  ऐसा न होता, कुछ
                                    नया सा होता, अगर 
                                    हम कभी मिले 
                                    ही न होते, कभी बस ....
                                    गुजर जाते किसी  
                                    भीड़ में एक - दूसरे की 
                                    अगल - बगल से,
                                  शायद ये ज्यादा 
                                  होता अच्छा, अगर 
                                  मै बचा लूं समय को 
                                  लौट कर अतीत में.....
                                  हम दोनों के लिए....

                                  बीते हुए सभी दिन... हफ्ते... 
                                  महीनों और सालो को 
                                  बचा लूं........ मै यदि -
                                  मै कही पीछे लौट कर, और 
                                  हम खुश रहे अपनी - अपनी 
                                  दुनीयाँ में, और यूही 
                                  गुजरते रहे कही न कही 
                                  ख्यालों में किसी भीड़ में, 
                                  हम दोनों, भीड़ की 
                                  लहरों में बहते 
                                  गुम हो जाते.....
                                  दो प्यारे अजनबी!!!!!

                                       9.10.2014 / 5:50 शाम