Wednesday, April 13, 2011

कलाकार

 कलाकार  



    धूप अभी भी फैली हुई थी! हवा भी गर्म थी! पूरी बिल्डिग में सभी अपने घरों में थे! पर चार बजते बजते कुछ घरों के दरवाजे खुलने लगते हैं! काम वालियो के काम पर आने का समय हो जाता है न शायद इसलिए, और तकरीबन पांच बजते बजते साईकिल की घंटी की आवाज से दूसरे फ्लोर पर रहने वाले रूद्रनाथ चौधरी के फ्लैट का दरवाजा भी खुलता और धीरे-धीरे वे सीढ़ियाँ उतरने लगते! अभी वे थोड़ी सीढ़ियाँ उतरे ही नहीं होते हैं की कोई सीढ़ियाँ तेजी से कूदता हुआ ........हेलो मिस्टर चौधरी, ....कहता हुआ तेजी से नीचे उतर जाता! उसका ये हेलो!
  
ये शोभीत है! मिस्टर चौधरी जब तक नीचे पहुचते वह ऊपर आ रहा होता है! हाथ में ढेर सारे खत और रंग बिरंगे कार्ड लिए हुए! चहरे पर लम्बी सी मुस्कराहट और आँखों में चमक लिए!
अपनी चिठ्ठियो वाला डब्बा खोल रूद्रनाथ चौधरी ने चिठ्ठियां निकाली! फोन का बिल, बिजली का बिल और समारोह का निमंत्रण पत्र था! डब्बा बंद कर रूद्रनाथ चौधरी धीरे धीरे वापिस सीढ़ियाँ चढने लगे! पहले फ्लोर पर रहने वाला एक पारसी परिवार हैं, सोहराबजी का! वहाँ से अक्सर संगीत की आवाज आती रहती है! सुबह और शाम उनका दरवाजा खुला रहता है! सोहराबजी की नानी आरामकुर्सी पर बैठी या तो स्वेटर बुन रही होती हैं या सो रही होती हैं! उनके पास एक मोटी सी बिल्ली है उसे वो लैला पुकारते हैं! लैला?
 




कई बार सीढ़ियाँ चढते उतरते वो दिखाई दे जाती है, उसकी चाल में अकड है और कई बार वो सोहराबजी की नानी के पावों के पास बैठी या सोई होती है! जब भी सुबह रुद्रनाथ चौधरी घर से निकलते है तो सोहराबजी का बेटा अखबार हाथ में लिए पढता हुआ बाहर आ रहा होता है, रुद्रनाथ चौधरी को देख वह मुस्कराता और वापिस अंदर मुड जाता!