Monday, February 21, 2011

लाट साहब की पवन चक्की


लाट साहब की पवन चक्की


गाँव से थोडी दूर खेतो से आगे, जंगल के करीब एक पवन चक्की थी ! एकदम अलग थलग अकेली खडी पवन चक्की, परंतु कोई ध्यान ही नही देता था ! जब भी जंगल सेखेतो की ओर और खेतो से जंगल की ओर हवा चलती तो उस पवन चक्की के जंग लगे पंख बडी मुश्किल से धीरे धीरे चू – चू की आवाज करते हुए घूमने लगते! कई बार जब हवा ज्यादा तेज न हो तो चक्की के पंखे चियू चिया की आवाज करके शांत हो जाते!






अक्सर मैं उस पवन चक्की की ओर निकल जाता और घंटो वही घूमता रहता ! नानी कई बार टोकती--- ‘तेरी उमर के बाल-बच्चे खेलते-कूदते है और तू अकेला घूमता रहता है!’

मुझे हमेशा उस चक्की के होने पर हैरानी होती थी !
मेरे कमरे की खिड़की से दूर वह चक्की साफ साफ दिखाई देती थी, रात अँधेरे में मुझे उस चक्की की आवाज सुनायी देती तो मेरा मन करता कि उसे एक बार देख आऊ! एक बार तो मै जाने के लिए तैयार भी हो गया, जैसे ही मै अपने कमरे से बाहर आया तो मेरी आहट से सूरज जाग गया!